उच्चतम न्यायालय ने यह सलाह हंसानंदिनी नंदूरी बनाम भारत संघ मामले में दी है।
पितृत्व अवकाश के बारे में
- यह बच्चे के जन्म या गोद लेने के बाद पिता को दी जाने वाली सवेतन या अवैतनिक अवकाश की अवधि है। इसका उद्देश्य बच्चों की प्रारंभिक देखभाल में भागीदारी करना और प्रसव के तुरंत बाद माँ को सहयोग करना है।
- भारत में स्थिति: हालांकि भारत में पितृत्व अवकाश को औपचारिक रूप से मान्यता नहीं मिली है, लेकिन यह अवधारणा पूरी तरह अनुपस्थित भी नहीं है।
- केंद्रीय सिविल सेवा (अवकाश) नियम: ये नियम पुरुष सरकारी कर्मचारियों को 15 दिनों का पितृत्व अवकाश प्रदान करते हैं।
- पितृत्व एवं अभिभावकीय लाभ विधेयक, 2025 (Paternity And Parental Benefit Bill, 2025): यह एक गैर-सरकारी विधेयक है, जिसमें 8 सप्ताह के पितृत्व अवकाश का प्रस्ताव किया गया है।
पितृत्व अवकाश शुरू करने की आवश्यकता
- अभिभावकत्व का स्वरूप: यह एक साझा जिम्मेदारी है। बच्चे के शुरुआती वर्षों में देखभाल के दौरान पिता की अनुपस्थिति को सामान्य या महत्वहीन नहीं माना जा सकता।
- अदृश्य अन्याय: समाज ने ऐतिहासिक रूप से बच्चों की देखभाल और पोषण की जिम्मेदारियों को केवल माताओं से जोड़कर देखा है। इसमें पिता की समान रूप से महत्त्वपूर्ण भूमिका की अनदेखी हुई है।
- यह सोच या धारणा "प्राकृतिक व्यवस्था" जैसी लगने लगी है और अब इसे अन्याय के रूप में नहीं देखा जाता।
- बाल कल्याण: बच्चे को माता-पिता, दोनों से भावनात्मक सहयोग और उचित देखभाल मिलनी चाहिए।
पितृत्व अवकाश प्रदान करने से जुड़ी प्रमुख समस्याएं
- सांस्कृतिक बदलाव की आवश्यकता: पुरुष सामाजिक लांछन के भय से पितृत्व अवकाश लेने में संकोच करते हैं।
- करियर पर प्रभाव का डर: प्रतिस्पर्धी कार्य परिवेश में लंबी छुट्टियां लेने से करियर विकास की संभावनाओं के कम होने का डर रहता है।
- असंगठित क्षेत्र का प्रभुत्व: भारत का अधिकतर कार्यबल असंगठित क्षेत्रक में कार्य करता है। इस वजह से उन्हें कानूनी सामाजिक सुरक्षाओं का लाभ नहीं मिल पाता है।
आगे की राह
- पितृसत्तात्मक मानसिकता में बदलाव लाने के साथ-साथ, स्वीडन जैसे वैश्विक मॉडलों पर विचार किया जा सकता है। इस मॉडल के तहत माता-पिता के बीच साझा करने के लिए 480 दिनों का सवेतन अभिभावकीय अवकाश (paid parental leave) प्रदान किया जाता है।