भारत-अमेरिका ने अति-महत्त्वपूर्ण और दुर्लभ मृदा खनिजों पर सहयोग के लिए फ्रेमवर्क पर हस्ताक्षर किए | Current Affairs | Vision IAS

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इस हस्ताक्षरित फ्रेमवर्क का नाम है-"अति-महत्त्वपूर्ण खनिजों और दुर्लभ मृदा तत्वों के खनन और प्रसंस्करण में आपूर्ति सुरक्षित करना" (Securing of Supply in the Mining and Processing of Critical Minerals and Rare Earths)। 

  • यह फ्रेमवर्क भारत-अमेरिका की पूर्व साझेदारियों, जैसे अमेरिका के नेतृत्व वाली पैक्स सिलिका और FORGE पहलों, पर आधारित है।   
  • इस फ्रेमवर्क का मुख्य लक्ष्य अति-महत्त्वपूर्ण खनिजों और दुर्लभ मृदा तत्वों की आपूर्ति श्रृंखला को मजबूत करना है। इसमें वित्तपोषण, पुनर्चक्रण (रीसाइक्लिंग) और आपूर्ति के स्रोतों में विविधता लाना शामिल हैं। 

अति-महत्त्वपूर्ण और दुर्लभ मृदा खनिज क्या हैं?

  • अति-महत्त्वपूर्ण खनिज (क्रिटिकल मिनरल्स): ये वे खनिज होते हैं जो किसी देश की अर्थव्यवस्था या विकास के लिए आवश्यक होते हैं। इनका वर्गीकरण हर देश में अलग-अलग होता है, जो उनकी उपलब्धता, उपयोग, निर्यात मूल्य और राष्ट्रीय आपूर्ति में जोखिम पर निर्भर करता है। 
    • अधिकतर देशों की अति-महत्त्वपूर्ण खनिजों की सूची में तांबा, लिथियम, निकल, कोबाल्ट, ग्रेफाइट और दुर्लभ मृदा तत्व शामिल हैं।
      • ध्यातव्य है कि सभी दुर्लभ मृदा खनिज 'अति-महत्त्वपूर्ण खनिज' होते हैं, लेकिन सभी अति-महत्त्वपूर्ण खनिज 'दुर्लभ मृदा खनिज' नहीं होते।
  • दुर्लभ मृदा तत्व (रेयर अर्थ एलिमेंट्स): ये 17 तत्वों का एक समूह है। ये हैं- स्कैंडियम, यट्रियम और 15 लैंथेनाइड्स)।
  • उपयोग: इनका उपयोग रक्षा क्षेत्र (रडार), इलेक्ट्रॉनिक्स, स्वच्छ ऊर्जा तकनीक (सोलर पैनल), आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), रोबोटिक्स और अंतरिक्ष अनुसंधान जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रकों में होता है।
  • चीन का प्रभुत्व: IEA के अनुसार, चीन के पास विश्व के 49% दुर्लभ मृदा खनिज भंडार हैं। वह 69% दुर्लभ मृदा खनिजों का उत्पादन करता है और उनके 90% प्रसंस्करण एवं शोधन पर नियंत्रण रखता है।
  • अन्य महत्त्वपूर्ण खनिजों में चीन 99% गैलियम शोधन90% से अधिक ग्रेफाइट और मैंगनीज प्रसंस्करण तथा 58% वैश्विक लिथियम शोधन पर प्रभुत्व रखता है।

नया फ्रेमवर्क भारत के लिए लाभकारी कैसे है?

  • आपूर्ति श्रृंखला की सुरक्षा: इससे भारत को अति-महत्त्वपूर्ण खनिजों के प्रसंस्करण के लिए चीन पर अपनी अत्यधिक निर्भरता कम करने में मदद मिलेगी।
  • स्वच्छ ऊर्जा और विनिर्माण को बढ़ावा: यह फ्रेमवर्क भारत को इलेक्ट्रिक वाहन (EV), बैटरी, सेमीकंडक्टर और नवीकरणीय ऊर्जा से संबंधित लक्ष्यों को पूरा करने के लिए खनिजों की सुलभ उपलब्धता सुनिश्चित करेगा।
  • प्रौद्योगिकी और निवेश की प्राप्ति: यह समझौता भारत में खनन, पुनर्चक्रण और रिफाइनिंग के क्षेत्र में विदेशी निवेश और अत्याधुनिक प्रसंस्करण तकनीक लाने में मदद करेगा।

 

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