केंद्र सरकार ने प्लास्टिक अपशिष्ट प्रबंधन (संशोधन) नियम, 2026 को अधिसूचित किया | Current Affairs | Vision IAS

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In Summary

  • प्लास्टिक अपशिष्ट प्रबंधन संशोधन नियम, 2024 के तहत पैकेजिंग में पुनर्चक्रित प्लास्टिक की मात्रा को उत्तरोत्तर बढ़ाना अनिवार्य है, हालांकि खाद्य पदार्थों के संपर्क में आने वाले अनुप्रयोगों के लिए छूट दी गई है।
  • इन संशोधनों में स्पष्ट परिभाषाएँ, कठोर पैकेजिंग के लिए न्यूनतम पुन: उपयोग लक्ष्य और पुनर्चक्रित सामग्री के लिए सख्त मानक शामिल किए गए हैं, जिनमें विशिष्ट लेबलिंग भी शामिल है।
  • प्रवर्तन को राज्य समिति की निगरानी और पंजीकृत पर्यावरण लेखा परीक्षकों द्वारा डिजिटल ट्रैकिंग के साथ यूएलबी को विकेंद्रीकृत किया गया है, जिससे ईपीआर और जवाबदेही मजबूत होती है।

In Summary

ये नियम प्लास्टिक अपशिष्ट प्रबंधन नियम, 2016 में संशोधन करते हैं, जिन्हें पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 के तहत अधिसूचित किया गया था।

संशोधन नियम 2026 के द्वारा प्रमुख परिवर्तन

  • अनिवार्य पुनर्नवीनीकृत सामग्री: उत्पादकों, आयातकों और ब्रांड मालिकों को अपनी पैकेजिंग में क्रमिक रूप से अधिक मात्रा में पुनर्नवीनीकृत प्लास्टिक का उपयोग करना होगा। 
    • जैसे कि श्रेणी I की प्लास्टिक पैकेजिंग में 2025-26 तक कम से कम 30% पुनर्चक्रित सामग्री का उपयोग अनिवार्य है, जिसे 2028-29 तक बढ़ाकर 60% करना होगा।
    • यदि भारतीय खाद्य संरक्षा और मानक प्राधिकरण (FSSAI) या केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन (CDSCO) जैसे सांविधिक निकाय कुछ उपयोगों के लिए पुनर्नवीनीकृत प्लास्टिक को प्रतिबंधित करते हैं, तो छूट लागू होगी।
    • खाद्य पदार्थों के संपर्क में आने वाली पैकेजिंग (फूड-कॉन्टैक्ट) में पुनर्चक्रित प्लास्टिक के उपयोग के जो लक्ष्य वित्त वर्ष 2025-26 में पूरे नहीं हो पाए, उन्हें अधिकतम तीन वर्षों तक आगे ले जाया जा सकता है।
  • स्पष्ट परिभाषाएँ: संशोधन में "एंड ऑफ लाइफ डिस्पोजल", "पुनः उपयोग" और "प्लास्टिक अपशिष्ट संसाधक" जैसी शब्दावलियों को स्पष्ट रूप से परिभाषित किया गया है, ताकि नियमों में किसी प्रकार की अस्पष्टता न रहे।
  • पुनः उपयोग के दायित्व: श्रेणी I (कठोर) की प्लास्टिक पैकेजिंग के लिए पुनर्चक्रित सामग्री के न्यूनतम पुनः उपयोग के लक्ष्य निर्धारित किए गए हैं (जैसे बड़े पेयजल कंटेनरों के लिए 85% तक)।
  • सख्त मानक: पुनर्नवीनीकृत पैकेजिंग को भारतीय मानक IS 14534:2023 के अनुरूप होना चाहिए और उस पर पुनर्नवीनीकृत सामग्री को दर्शाने वाले विशेष लेबल होने चाहिए।
  • विनियमन एवं क्रियान्वयन: इसे शहरी स्थानीय निकायों (ULBs) द्वारा विकेंद्रीकृत रूप से लागू किया जाएगा, जिसकी निगरानी राज्य स्तरीय समिति करेगी। साथ ही पंजीकृत पर्यावरण ऑडिटर द्वारा डिजिटल ट्रैकिंग और ऑडिट कि जाए

प्लास्टिक अपशिष्ट प्रबंधन नियमों का महत्व

  • चक्रीय अर्थव्यवस्था (Circular Economy): पुनर्चक्रण और पुनः उपयोग को बढ़ावा देकर नए प्लास्टिक पर निर्भरता कम की जा सकती है और संसाधन के दक्षतापूर्वक उपयोग को बढ़ावा मिलता है।
  • पर्यावरण का संरक्षण: स्थलीय और समुद्री पारिस्थितिक तंत्र में प्लास्टिक प्रदूषण को कम करने में मदद मिलती है।
  • लोक स्वास्थ्य: प्लास्टिक अपशिष्ट, माइक्रोप्लास्टिक्स और विषाक्त प्रभावों से स्वास्थ्य को होने वाले जोखिमों को कम किया जा सकता है।
  • शासन में सुधार: प्लास्टिक अपशिष्ट प्रबंधन में विस्तारित उत्पादक उत्तरदायित्व (EPR) को लागू करने, नियमों के अनुपालन और जवाबदेही तय करने में मदद मिलती है।

प्लास्टिक अपशिष्ट प्रबंधन नियम, 2016 के बारे में

  • उद्देश्य: प्लास्टिक अपशिष्ट के उत्पादन को कम करना, पुनर्चक्रण को बढ़ावा देना और पर्यावरण-अनुकूल तरीके से अपशिष्टों का निपटान सुनिश्चित करना।
  • मुख्य प्रावधान:
    • विस्तारित उत्पादक उत्तरदायित्व (EPR): उत्पादक, आयातक और ब्रांड मालिक प्लास्टिक अपशिष्ट के संग्रह, पुनर्चक्रण और निपटान के लिए जिम्मेदार होते हैं।
    • सिंगल-यूज प्लास्टिक पर प्रतिबंध (2022 में संशोधन): प्लास्टिक प्रदूषण को कम करने के लिए कुछ चिन्हित सिंगल-यूज प्लास्टिक वस्तुओं पर प्रतिबंध लगा दिया गया है।
      • प्लास्टिक मोटाई मानक: पुनः उपयोग को बढ़ावा देने और अपशिष्ट फैलाव (लिटरिंग) को कम करने के लिए अनुमत सिंगल यूज प्लास्टिक की न्यूनतम मोटाई 120 माइक्रोन निर्धारित की गई है।
    • निगरानी (2025 संशोधन): 1 जुलाई 2025 से, सभी प्लास्टिक पैकेजिंग पर बारकोड या QR कोड होना अनिवार्य है, जिससे उत्पादन से लेकर निपटान तक डिजिटल तरीके से निगरानी संभव हो सके।
    • स्थानीय निकायों की भूमिका: शहरी स्थानीय निकाय (ULBs) और ग्राम पंचायतें प्लास्टिक अपशिष्ट के संग्रह, पृथक्करण और प्रसंस्करण के लिए जिम्मेदार हैं।
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डिजिटल ट्रैकिंग और ऑडिट

यह एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें उत्पादों या सामग्रियों के उत्पादन से लेकर निपटान तक की गतिविधियों को डिजिटल साधनों का उपयोग करके ट्रैक और सत्यापित किया जाता है, जिससे पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित होती है।

शहरी स्थानीय निकाय (ULBs)

ये भारत में नगरपालिकाएँ, नगर परिषदें, और नगर निगम जैसी स्थानीय सरकारी संस्थाएँ होती हैं जो शहरी क्षेत्रों में बुनियादी ढाँचे, सार्वजनिक सेवाओं और नागरिक सुविधाओं के प्रबंधन के लिए जिम्मेदार होती हैं। अपशिष्ट जल प्रबंधन भी इनकी प्रमुख जिम्मेदारियों में से एक है।

माइक्रोन

यह लंबाई मापने की एक मीट्रिक इकाई है, जो मीटर का दस लाखवां हिस्सा (10^-6 मीटर) होती है। प्लास्टिक की मोटाई को मापने के लिए इसका उपयोग किया जाता है।

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