गुजरात विधानसभा ने गुजरात समान नागरिक संहिता (UCC), 2026 विधेयक पारित किया | Current Affairs | Vision IAS

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  • गुजरात ने एक समान नागरिक संहिता (यूसीसी) विधेयक पारित किया, जिसमें अनुसूचित जनजातियों को छोड़कर विवाह, तलाक, उत्तराधिकार और लिव-इन रिलेशनशिप के लिए एक समान कानूनी ढांचा स्थापित किया गया है।
  • यूसीसी का उद्देश्य धर्म आधारित व्यक्तिगत कानूनों को प्रतिस्थापित करके कानून के समक्ष समानता, लैंगिक न्याय और राष्ट्रीय एकता सुनिश्चित करना है, जिसकी आवश्यकता को सुप्रीम कोर्ट ने शाह बानो जैसे मामलों में उजागर किया है।
  • यूसीसी के कार्यान्वयन में आने वाली चुनौतियों में विविधता और धार्मिक स्वतंत्रता के लिए संभावित खतरे, साथ ही समुदायों के बीच आम सहमति की कमी शामिल है।

In Summary

इस विधेयक के पारित होने के साथ, गुजरात उत्तराखंड के बाद समान नागरिक संहिता अपनाने वाला देश का दूसरा राज्य बन गया है।

‘गुजरात समान नागरिक संहिता विधेयक’ के बारे में

  • उद्देश्य: विवाह, तलाक, उत्तराधिकार, समान संपत्ति अधिकार और लिव-इन संबंधों को धर्म के आधार पर अलग-अलग नियमों के बजाय, सभी के लिए एक समान कानून के तहत लाना।
  • अपवाद: इसके प्रावधान अनुसूचित जनजातियों (ST) और उन विशिष्ट समूहों पर लागू नहीं होंगे जिनके पारंपरिक अधिकारों को संविधान के तहत संरक्षण प्राप्त है।
  • मुख्य प्रावधान:
    • द्विविवाह यानी एक से अधिक शादी (Bigamy) प्रतिबंधित है। कोई भी व्यक्ति अपने जीवनसाथी के जीवित रहते दूसरी शादी नहीं कर सकता।
    • लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वालों को इसका अनिवार्य पंजीकरण कराना होगा।

समान नागरिक संहिता (UCC) के बारे में

  • राज्य नीति के निर्देशक सिद्धांतों (DPSP) के अंतर्गत संविधान का अनुच्छेद 44 राज्य (सरकार) को निर्देश देता है कि वह पूरे भारत में सभी नागरिकों के लिए समान नागरिक संहिता (UCC) लागू करने का प्रयास करे।
  • गोवा में, 1867 के पुर्तगाली नागरिक संहिता के तहत एक प्रकार की सामान्य नागरिक संहिता पहले से ही प्रचलन में है।
  • भारत में आवश्यकता:
    • विधि के समक्ष समता: समान कानून अलग-अलग धर्मों के पर्सनल लॉ (जैसे-हिंदू विवाह अधिनियम, मुस्लिम पर्सनल लॉ यानी शरिया, आदि) का स्थान लेगा।
    • महिलाओं के अधिकार उनके धर्म के अनुसार अलग-अलग होते हैं, और कई पारंपरिक कानून पुरुष प्रधान होते हैं। इससे महिलाओं को विरासत और संपत्ति में समान अधिकार नहीं मिल पाते।
      • उच्चतम न्यायालय ने शाह बानो केस 1985सरला मुद्गल केस 1995 जैसे कई मामलों में इन समस्याओं से निपटने के लिए UCC लागू करने की आवश्यकता पर जोर दिया।
    • राष्ट्रीय एकता: यह संहिता पर्सनल लॉ से धर्म को अलग करती है, जिससे सामाजिक सद्भाव को बढ़ावा मिलता है।
  • कार्यान्वयन में चुनौतियां: 
    • इस कानून को भारत की विविधता और धार्मिक स्वतंत्रता के लिए खतरा माना जाता है, 
    • इस कानून को लेकर समुदायों के बीच आम सहमति का अभाव है आदि। 
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अनुसूचित जनजातियाँ (Scheduled Tribes - ST)

यह भारतीय संविधान के तहत मान्यता प्राप्त आदिवासी समुदायों का एक समूह है, जिन्हें सामाजिक, शैक्षिक और आर्थिक रूप से पिछड़े होने के कारण विशेष संवैधानिक सुरक्षा और लाभ प्रदान किए जाते हैं। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 342 के तहत इन्हें सूचीबद्ध किया गया है।

सरला मुद्गल केस 1995

एक सुप्रीम कोर्ट का मामला जिसने धर्म परिवर्तन के बाद भी प्रथम विवाह की वैधता के संबंध में व्यक्तिगत कानूनों की जटिलताओं को उजागर किया और UCC की आवश्यकता पर बल दिया।

शाह बानो केस 1985

एक ऐतिहासिक सुप्रीम कोर्ट का मामला जिसने मुस्लिम महिलाओं के भरण-पोषण के अधिकारों पर फैसला सुनाया और देश में समान नागरिक संहिता (UCC) की आवश्यकता पर व्यापक बहस छेड़ दी।

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