इस विधेयक के पारित होने के साथ, गुजरात उत्तराखंड के बाद समान नागरिक संहिता अपनाने वाला देश का दूसरा राज्य बन गया है।
‘गुजरात समान नागरिक संहिता विधेयक’ के बारे में
- उद्देश्य: विवाह, तलाक, उत्तराधिकार, समान संपत्ति अधिकार और लिव-इन संबंधों को धर्म के आधार पर अलग-अलग नियमों के बजाय, सभी के लिए एक समान कानून के तहत लाना।
- अपवाद: इसके प्रावधान अनुसूचित जनजातियों (ST) और उन विशिष्ट समूहों पर लागू नहीं होंगे जिनके पारंपरिक अधिकारों को संविधान के तहत संरक्षण प्राप्त है।
- मुख्य प्रावधान:
- द्विविवाह यानी एक से अधिक शादी (Bigamy) प्रतिबंधित है। कोई भी व्यक्ति अपने जीवनसाथी के जीवित रहते दूसरी शादी नहीं कर सकता।
- लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वालों को इसका अनिवार्य पंजीकरण कराना होगा।
समान नागरिक संहिता (UCC) के बारे में
- राज्य नीति के निर्देशक सिद्धांतों (DPSP) के अंतर्गत संविधान का अनुच्छेद 44 राज्य (सरकार) को निर्देश देता है कि वह पूरे भारत में सभी नागरिकों के लिए समान नागरिक संहिता (UCC) लागू करने का प्रयास करे।
- गोवा में, 1867 के पुर्तगाली नागरिक संहिता के तहत एक प्रकार की सामान्य नागरिक संहिता पहले से ही प्रचलन में है।
- भारत में आवश्यकता:
- विधि के समक्ष समता: समान कानून अलग-अलग धर्मों के पर्सनल लॉ (जैसे-हिंदू विवाह अधिनियम, मुस्लिम पर्सनल लॉ यानी शरिया, आदि) का स्थान लेगा।
- महिलाओं के अधिकार उनके धर्म के अनुसार अलग-अलग होते हैं, और कई पारंपरिक कानून पुरुष प्रधान होते हैं। इससे महिलाओं को विरासत और संपत्ति में समान अधिकार नहीं मिल पाते।
- उच्चतम न्यायालय ने शाह बानो केस 1985, सरला मुद्गल केस 1995 जैसे कई मामलों में इन समस्याओं से निपटने के लिए UCC लागू करने की आवश्यकता पर जोर दिया।
- राष्ट्रीय एकता: यह संहिता पर्सनल लॉ से धर्म को अलग करती है, जिससे सामाजिक सद्भाव को बढ़ावा मिलता है।
- कार्यान्वयन में चुनौतियां:
- इस कानून को भारत की विविधता और धार्मिक स्वतंत्रता के लिए खतरा माना जाता है,
- इस कानून को लेकर समुदायों के बीच आम सहमति का अभाव है आदि।