देश के 21 राज्यों के 593 जिलों के विश्लेषण पर आधारित यह अध्ययन दर्शाता है कि भारत में निर्धनता अब जलवायु परिवर्तन से गहराई से जुड़ गई है। इसके लिए तत्काल नीतिगत उपाय करने की आवश्यकता है।
- राष्ट्रीय विज्ञान शिक्षा और अनुसंधान संस्थान (NISER) भारत सरकार के परमाणु ऊर्जा विभाग के तहत एक स्वायत्त अनुसंधान संस्थान है।
जलवायु परिवर्तन और निर्धनता के बीच संबंध
- जलवायु-जनित आर्थिक तनाव:
- बार-बार आने वाली बाढ़: ये फसलों, अवसंरचनाओं और घरों को नुकसान पहुंचाती हैं। इससे आपदा प्रभावित आबादी ‘नुकसान और इससे उबरने के अंतहीन चक्र’ में फंस जाती है।
- सूखे की वजह से संकट: कृषि पर निर्भर सूखा प्रवण क्षेत्रों को फसल की विफलता और ऋण जाल के कारण उच्च निर्धनता स्तर का सामना करना पड़ता है।
- बचाव के रूप में आर्थिक विविधीकरण: सेवा क्षेत्रक-उन्मुख अर्थव्यवस्थाएं मौसम के व्यवधानों से कम प्रभावित होती हैं और अधिक स्थिर आय के अवसर प्रदान करती हैं।
- सकल राज्य घरेलू उत्पाद (GSDP) में सेवा क्षेत्रक की 1 यूनिट की वृद्धि निर्धनता की संभावना को लगभग 1.9% कम कर देती है।
- आदिवासियों के अधिक प्रभावित होने की संभावना: अनुसूचित जनजाति (ST) की आबादी को जलवायु जनित आपदाओं से अधिक मुश्किलों का सामना करना पड़ता है क्योंकि वे प्राकृतिक संसाधनों पर अत्यधिक निर्भर हैं। उनमें निर्धनता में रहने की आशंका अधिक देखी गई है।
आगे की राह
- अलग-अलग क्षेत्रों के लिए अलग-अलग नीतियां: 'सभी क्षेत्रों के लिए एक समान नीति’ के बजाय स्थानीय परिस्थितियों के आधार पर जिला-स्तरीय लक्षित रणनीतियां अपनाने की आवश्यकता है।
- कार्यान्वयन में सुधार करना: राष्ट्रीय जलवायु परिवर्तन कार्य-योजना (NAPCC), राज्य जलवायु परिवर्तन कार्य-योजना (SAPCC) और SDG इंडिया सूचकांक के बेहतर क्रियान्वयन की आवश्यकता है।
- जलवायु-अनुकूल कृषि: सूखा-सहिष्णु फसलों और दक्ष सिंचाई-प्रणालियों, आदि को बढ़ावा देना चाहिए।
- अन्य उपाय: इनमें निम्नलिखित शामिल हैं;
- गैर-कृषि क्षेत्रकों में रोजगार के अवसर सृजित करना,
- एकीकृत नीति निर्माण, और
- आपदा-रोधी अवसंरचनाओं के निर्माण में निवेश।