इस सम्मेलन में, भारत ने 'चोकपॉइंट' में व्यवधान से जुड़ी नई चिंताओं को दूर करने की आवश्यकता पर बल दिया। साथ ही, भारत ने लचीलापन (रेजिलिएंस) बढ़ाने तथा स्थिर और सहयोगात्मक क्षेत्रीय विकास सुनिश्चित करने के लिए विश्वसनीय साझेदारी बनाने पर जोर दिया।
हिंद महासागर सम्मेलन (IOC) के बारे में

- इस सम्मेलन की शुरुआत 2016 में इंडिया फाउंडेशन द्वारा क्षेत्रीय थिंक टैंकों और संस्थानों के सहयोग से की गई थी।
- इसमें 40 से अधिक देशों की भागीदारी है।
- यह सम्मेलन हिंद महासागर क्षेत्र (IOR) के देशों के लिए क्षेत्रीय विषयों पर एक प्रमुख परामर्श मंच के रूप में उभरा है। यह ‘क्षेत्र में सभी के लिए सुरक्षा और विकास (SAGAR)’ के सिद्धांत के लिए क्षेत्रीय सहयोग पर विचार-विमर्श करता है।
हिंद महासागर क्षेत्र (IOR) और इसका महत्व
- यह 70 मिलियन वर्ग किलोमीटर से अधिक क्षेत्र में फैला हुआ है। यह क्षेत्र 35 से अधिक तटीय देशों को जोड़ता है, और विश्व की लगभग 40% आबादी इस क्षेत्र में निवास करती है।
- महत्व:
- आर्थिक और व्यापारिक महत्व: यह क्षेत्र वैश्विक कंटेनर यातायात का लगभग 50%, एक-तिहाई बल्क कार्गो और दो-तिहाई ऑयल शिपमेंट को संभालता है।
- रणनीतिक और भू-राजनीतिक मूल्य:
- महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों और चोकपॉइंट्स (जैसे— होर्मुज जलडमरूमध्य) होने के कारण यह क्षेत्र अत्यंत महत्वपूर्ण है।
- भारत की 11,098.81 किलोमीटर लंबी तटरेखा और 1,300 से अधिक द्वीप इसे हिंद महासागर की सुरक्षा व्यवस्था का केंद्र बनाते हैं।
- ब्लू इकोनॉमी की क्षमता: भारत का लगभग 2.4 मिलियन वर्ग किमी में विस्तृत विशाल अनन्य आर्थिक क्षेत्र (EEZ) संधारणीय मात्स्यिकी, नवीकरणीय समुद्री ऊर्जा, इको-टूरिज्म और समुद्री जैव विविधता संरक्षण में बड़े अवसर प्रदान करते हैं।
- पारिस्थितिकी और पर्यावरणीय दृष्टि से महत्व: यह विश्व का सबसे गर्म महासागर है। इस वजह से यह पारिस्थितिक रूप से अत्यंत सक्रिय और जैविक रूप से उत्पादक क्षेत्र है।
- IOR में भारत की भूमिका:
- निवल सुरक्षा प्रदाता के रूप में भारत समुद्री डकैती-रोधी और एंटी-नारकोटिक्स अभियानों के माध्यम से समुद्री सुरक्षा सुनिश्चित करता है।
- प्रथम सहायताकर्ता के रूप में भारत हिंद महासागर क्षेत्र के देशों को संकट के समय त्वरित मानवीय सहायता और आपदा राहत प्रदान करता है।
IOR में प्रमुख चुनौतियां:
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