भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) ने 'न्याय तक पहुँच' को न्याय प्रणाली की प्राथमिक बाधा बताया | Current Affairs | Vision IAS

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In Summary

  • न्याय तक पहुंच में प्रमुख बाधाओं में आर्थिक, भौगोलिक, संस्थागत, प्रक्रियात्मक, भाषा संबंधी, जागरूकता की कमी और सामाजिक भेदभाव शामिल हैं।
  • अनुच्छेद 39ए, एडीआर, ग्राम न्यायालय, ई-कोर्ट और प्रक्रियात्मक सुधार जैसी पहलों का उद्देश्य न्याय तक पहुंच में सुधार करना है।

In Summary

मुख्य न्यायाधीश ने स्पष्ट किया कि प्राथमिक चुनौती कानूनों की कमी नहीं है, बल्कि आम नागरिकों की उन तक पहुँच का सीमित होना है।

न्याय तक पहुँच में प्रमुख बाधाएं

  • आर्थिक और भौगोलिक कारण: 
    • निर्धनता और उच्च लागत: उदाहरण के लिए, इंडिया जस्टिस रिपोर्ट 2025 के अनुसार, भारत के लगभग 75% कैदी विचाराधीन हैं। इनमें से कई कैदी केवल जमानत राशि न भर पाने के कारण जेल से बाहर नहीं आ पा रहे हैं।  
    • भौतिक दूरी: पहाड़ी, पर्वतीय और दूरदराज के क्षेत्रों में रहने वाले लोगों के लिए अदालतों तक पहुँचना दुष्कर कार्य है।
  • संस्थागत और प्रक्रियात्मक कारक: 
    • व्यवस्थागत देरी, जटिल प्रक्रियाएं, अपर्याप्त अवसंरचना और कर्मचारियों की कमी।
    • भाषा की बाधा: उच्च न्यायालयों में अंग्रेजी भाषा में कार्यवाही उन वादियों को अलग-थलग कर देती है जो अंग्रेजी नहीं जानते
    • जागरूकता की कमी और विधिक सहायता प्रदान करने में कमियां: निःशुल्क विधिक सहायता योजना का क्रियान्वयन सही से नहीं हो पा रहा है।
  • सामाजिक, सांस्कृतिक और अंतर-अनुभागीय:
    • ब्लैक कोट सिंड्रोम: यह उन डर, चिंता और अलगाव की भावना को दर्शाता है, जो वंचित समुदायों के लोगों को न्याय व्यवस्था से जुड़ते या उसे समझते समय महसूस होती है।
    • भेदभाव और संस्थागत उदासीनता: हाशिए पर रहने वाले समूहों को पूर्वाग्रह और कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।
    • बार-बार प्रताड़ना का सामना करना (Secondary Victimization): यौन उत्पीड़न के पीड़ितों को सामाजिक दबाव, डराने-धमकाने और अपमान का सामना करना पड़ता है।
    • विश्वास की कमी और निहित स्वार्थ: भ्रष्टाचार और सुधारों का विरोध न्यायपालिका में जनता के विश्वास को कम करता है।

न्याय तक पहुँच को बढ़ावा देने के लिए की गई पहलें

  • सांविधानिक व्यवस्थाअनुच्छेद 39A के तहत राज्य द्वारा नागरिक को समान अवसर और निःशुल्क विधिक सहायता प्रदान कराने का निर्देश दिया गया है। इसी के कार्यान्वयन के लिए विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम 1987 के तहत पात्र लोगों को राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण (NALSA) निःशुल्क विधिक सहायता प्रदान करता है। 
  • वैकल्पिक विवाद समाधान (ADR) तंत्र को बढ़ावा देना: लोक अदालतें मध्यस्थता, अभियोजन से पूर्व सुलह और त्वरित समाधान की सुविधाएं प्रदान करती हैं।
  • विकेंद्रीकरण: ग्राम न्यायालय अधिनियम, 2008 स्थानीय अदालतों को सक्षम बनाता है ताकि ग्रामीण क्षेत्रों में कम खर्च पर और त्वरित गति से न्याय उपलब्ध कराया जा सके।
  • प्रौद्योगिकियों को अपनाना: उदाहरण के लिए, ई-कोर्ट मिशन मोड प्रोजेक्ट और राष्ट्रीय न्यायिक डेटा ग्रिड (NJDG) जैसी पहलें शुरू की गई हैं।
  • प्रक्रियात्मक सुधार: उदाहरण के लिए, फास्ट ट्रैक कोर्ट और विचाराधीन कैदी समीक्षा समितियां गठित की गई हैं।
  • स्थानीय और संदर्भ-विशिष्ट रणनीतियां: न्याय तक पहुँच परियोजना (Access to Justice Project), वन स्टॉप सेंटर और महिला हेल्प डेस्क जैसी पहलें स्थानीय जरूरतों के अनुसार न्याय और सहायता उपलब्ध कराती हैं।
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वन स्टॉप सेंटर (One Stop Centre)

Initiatives established to provide integrated support and assistance to women affected by violence, both in private and public spaces. These centers offer a range of services including medical aid, legal counseling, psychological support, and shelter under one roof.

विचाराधीन कैदी समीक्षा समितियां (Undertrial Review Committees)

Committees formed to review the cases of undertrial prisoners, particularly those who have spent a considerable period in custody without trial. Their objective is to identify cases where relief can be granted and to expedite the judicial process for such prisoners.

राष्ट्रीय न्यायिक डेटा ग्रिड (NJDG)

A platform that provides a comprehensive database of judicial orders, judgments, and case statistics for all courts in India. It is part of the e-Courts project and aims to enhance transparency and facilitate data-driven analysis of the justice system.

Title is required. Maximum 500 characters.

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