मुख्य न्यायाधीश ने स्पष्ट किया कि प्राथमिक चुनौती कानूनों की कमी नहीं है, बल्कि आम नागरिकों की उन तक पहुँच का सीमित होना है।
न्याय तक पहुँच में प्रमुख बाधाएं
- आर्थिक और भौगोलिक कारण:
- निर्धनता और उच्च लागत: उदाहरण के लिए, इंडिया जस्टिस रिपोर्ट 2025 के अनुसार, भारत के लगभग 75% कैदी विचाराधीन हैं। इनमें से कई कैदी केवल जमानत राशि न भर पाने के कारण जेल से बाहर नहीं आ पा रहे हैं।
- भौतिक दूरी: पहाड़ी, पर्वतीय और दूरदराज के क्षेत्रों में रहने वाले लोगों के लिए अदालतों तक पहुँचना दुष्कर कार्य है।
- संस्थागत और प्रक्रियात्मक कारक:
- व्यवस्थागत देरी, जटिल प्रक्रियाएं, अपर्याप्त अवसंरचना और कर्मचारियों की कमी।
- भाषा की बाधा: उच्च न्यायालयों में अंग्रेजी भाषा में कार्यवाही उन वादियों को अलग-थलग कर देती है जो अंग्रेजी नहीं जानते।
- जागरूकता की कमी और विधिक सहायता प्रदान करने में कमियां: निःशुल्क विधिक सहायता योजना का क्रियान्वयन सही से नहीं हो पा रहा है।
- सामाजिक, सांस्कृतिक और अंतर-अनुभागीय:
- ब्लैक कोट सिंड्रोम: यह उन डर, चिंता और अलगाव की भावना को दर्शाता है, जो वंचित समुदायों के लोगों को न्याय व्यवस्था से जुड़ते या उसे समझते समय महसूस होती है।
- भेदभाव और संस्थागत उदासीनता: हाशिए पर रहने वाले समूहों को पूर्वाग्रह और कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।
- बार-बार प्रताड़ना का सामना करना (Secondary Victimization): यौन उत्पीड़न के पीड़ितों को सामाजिक दबाव, डराने-धमकाने और अपमान का सामना करना पड़ता है।
- विश्वास की कमी और निहित स्वार्थ: भ्रष्टाचार और सुधारों का विरोध न्यायपालिका में जनता के विश्वास को कम करता है।
न्याय तक पहुँच को बढ़ावा देने के लिए की गई पहलें
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