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राजा रवि वर्मा (1848–1906) 

राजा रवि वर्मा की एक पेंटिंग 167 करोड़ रुपये में बिकी है। यह बिक्री कला के मूल्य निर्धारण में कला की दुर्लभता और सांस्कृतिक मूल्य की भूमिका को उजागर करती है। यह बिक्री कला संबंधी बाजार की गतिशीलता के प्रभाव को भी प्रदर्शित करती है। 

राजा रवि वर्मा के बारे में:

  • उनका जन्म किलिमानूर (त्रावणकोर, केरल) में हुआ था।
  • वे केरल के त्रावणकोर के महाराजाओं के परिवार से संबंधित थे और उन्हें 'राजा' के रूप में संबोधित किया जाता था।
  • उन्हें ‘आधुनिक भारतीय कला का जनक’ कहा जाता है।

प्रमुख योगदान: 

  • उन्होंने पाश्चात्य तैल चित्रण कला और यथार्थवादी जीवन के चित्रांकन में महारत हासिल की। 
  • उन्होंने भारतीय पौराणिक कथाओं के विषयों पर चित्रकारी की। इसमें रामायण और महाभारत जैसे लोकप्रिय महाकाव्यों के दृश्यों को चित्रित किया गया है। 
  • प्रिंटिंग प्रेस की स्थापना: 1894 में गिरगाम (अब गिरगांव), बॉम्बे में 'रवि वर्मा फाइन आर्ट लिथोग्राफिक प्रेस' और FAL प्रेस की स्थापना की गई थी। 
    • यह भारत में बड़े पैमाने पर मुद्रण तकनीकों का उपयोग करने वाले शुरुआती प्रेसों में से एक था। यह एक प्रतिष्ठित कलाकारों की कृतियों का बड़े पैमाने पर मुद्रण करने वाला पहला प्रेस था। 
  • सबसे प्रसिद्ध कृतियाँ: हंस से बात करती दमयंती, शकुंतला को दुष्यंत की तलाश, बालों को संवारती नायर महिला, और शांतनु एवं मत्स्यगंधा।
  • पुरस्कार और सम्मान: ब्रिटिश सम्राट की ओर से लॉर्ड कर्जन द्वारा 1904 में केसर-ए-हिंद स्वर्ण पदक प्रदान किया गया। इस प्रशस्ति पत्र में पहली बार औपचारिक रूप से "राजा" उपाधि का उपयोग किया गया था।
  • मूल्य: सांस्कृतिक राष्ट्रवाद, सौंदर्य उत्कृष्टता, मानवतावाद आदि।
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सांस्कृतिक राष्ट्रवाद

यह एक ऐसी विचारधारा है जो राष्ट्रीय पहचान को साझा सांस्कृतिक मूल्यों, जैसे भाषा, कला, धर्म और परंपराओं पर आधारित करती है। राजा रवि वर्मा की कला को अक्सर सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के विकास में योगदान देने वाला माना जाता है।

केसर-ए-हिंद स्वर्ण पदक

ब्रिटिश सम्राट द्वारा भारत में महत्वपूर्ण सेवा करने वाले व्यक्तियों को प्रदान किया जाने वाला एक प्रतिष्ठित पुरस्कार। राजा रवि वर्मा को 1904 में लॉर्ड कर्जन द्वारा यह पदक प्रदान किया गया था, जिसने उनकी कलात्मक उपलब्धियों को मान्यता दी।

रवि वर्मा फाइन आर्ट लिथोग्राफिक प्रेस

राजा रवि वर्मा द्वारा 1894 में स्थापित एक प्रिंटिंग प्रेस। यह भारत में बड़े पैमाने पर कलाकृतियों के मुद्रण के लिए प्रारंभिक और महत्वपूर्ण प्रतिष्ठानों में से एक था, जिसने उनकी कृतियों को व्यापक दर्शकों तक पहुँचाया।

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