सीबीआई की मदद से वन्यजीव अपराध के एक मामले में पहली बार एक आरोपी को दोषी ठहराया गया | Current Affairs | Vision IAS

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In Summary

  • दिल्ली की एक अदालत ने वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 का उल्लंघन करते हुए शाहतोश शॉल के अवैध निर्यात के लिए एक व्यक्ति को दोषी ठहराया।
  • शाहतूश ऊन तिब्बती मृग (चिरू) को मारकर प्राप्त किया जाता है, जिसका व्यापार 1975 से CITES के तहत विश्व स्तर पर प्रतिबंधित है।
  • चिरू (पैंथोलॉप्स हॉजसोनी) संकटग्रस्त (IUCN) श्रेणी में है, इसे अनुसूची I और IV (WPA) और परिशिष्ट I (CITES) के तहत सूचीबद्ध किया गया है, और यह अवैध शिकार और आवास के नुकसान से खतरे का सामना कर रही है।

In Summary

एक ऐतिहासिक फैसले में, दिल्ली की एक अदालत ने वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 के उल्लंघन के आरोपी एक व्यक्ति को दोषी ठहराया। आरोपी पर तिब्बती मृग (Tibetan Antelope) के बालों से बनी शहतूश शॉल के अवैध निर्यात का आरोप था।

  • CBI, वन्यजीव अपराध नियंत्रण ब्यूरो (WCCB), सीमा शुल्क अधिकारी और भारतीय वन्यजीव संस्थान (WII) के संयुक्त अभियान में कार्रवाई की गई। यह कार्यवाही अलग-अलग सुरक्षा सुरक्षा एजेंसियों के बीच बेहतर समन्वय को रेखांकित करती है। 

शहतूश ऊन के बारे में

  • शहतूश मृग के शरीर के निचले हिस्से के बाल (under fleece) होते हैं और इन्हें केवल तिब्बती मृग का शिकार करके ही प्राप्त किया जा सकता है। तिब्बती मृग को स्थानीय भाषा में चिरू कहा जाता है।  
    • लगभग सभी शहतूश की कताई और बुनाई जम्मू-कश्मीर में अवैध रूप से की जाती है।
  • रंग: भूरे, बेज और स्लेटी रंग के विभिन्न शेड्स, जो चिरू के लिंग (जेंडर) और शरीर के हिस्से पर निर्भर करते हैं।
  • कानूनी प्रतिबंध: शहतूश शॉल के व्यापार पर “वन्य जीवों और वनस्पतियों की लुप्तप्राय प्रजातियों के अंतर्राष्ट्रीय व्यापार पर कन्वेंशन (CITES)” के तहत 1975 से वैश्विक स्तर पर प्रतिबंध लगा दिया गया है। भारत भी इस कन्वेंशन का हस्ताक्षरकर्ता देश है।

चिरू के बारे में

  • वैज्ञानिक नाम: पैंथोलोप्स हॉजसोनी।
  • पर्यावास: जहाँ औसत वार्षिक तापमान शून्य से नीचे रहता है, जैसे तिब्बती पठार और पश्चिमी चीन के शिनजियांग और किंघाई प्रांत।
    • भारत में चिरू की आबादी (समष्टि) प्रवासी है।
    • भारत में चिरू के प्रजनन के कई प्रयास किए गए, लेकिन कोई सफलता नहीं मिली।
  • संरक्षण स्थिति:
    • वन्यजीव संरक्षण अधिनियम (WPA), 1972: अनुसूची I और IV. 
    • CITES: परिशिष्ट-1
    • IUCN रेड लिस्ट: नियर थ्रीटेंड। 
  • मुख्य खतरे: अवैध शिकार, पर्यावास का नष्ट होना और प्रतिकूल प्राकृतिक वातावरण जिसमें वे रहते हैं।

जानवरों के अवैध व्यापार को रोकने के लिए विभिन्न पहलें

  • CITES: यह वन्यजीव व्यापार को विनियमित करने वाला विधिक रूप से बाध्यकारी समझौता है।
  • वन्यजीव अपराध पहल (WCI): WWF और TRAFFIC द्वारा 2014 में शुरू की गई इस पहल का उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय संगठित वन्यजीव-अपराधों से निपटना है।
  • ‘वाइल्ड फॉर लाइफ’ अभियान: UNEP के नेतृत्व वाली यह पहल सोशल मीडिया के माध्यम से अवैध वन्यजीव उत्पादों की मांग को कम करती है।
  • भारत में पहलें: वन्यजीवों के अवैध व्यापार को नियंत्रित करने के लिए वन्यजीव अपराध नियंत्रण ब्यूरो (WCCB) की स्थापना की गई है।
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वन्यजीव अपराध पहल (WCI)

यह WWF (World Wide Fund for Nature) और TRAFFIC (The Wildlife Trade Monitoring Network) द्वारा शुरू की गई एक पहल है। इसका उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय संगठित वन्यजीव अपराधों का मुकाबला करना, वन्यजीवों की तस्करी को रोकना और संबंधित कानूनी एवं प्रवर्तन तंत्र को मजबूत करना है।

IUCN रेड लिस्ट

एक वैश्विक सूची जो प्रजातियों के विलुप्त होने के जोखिम का आकलन करती है। 'क्रिटिकली एंडेंजर्ड' (गंभीर रूप से संकटग्रस्त) का अर्थ है कि प्रजाति के निकट भविष्य में जंगली में विलुप्त होने का अत्यधिक उच्च जोखिम है।

CITES परिशिष्ट-1

CITES के तहत, परिशिष्ट-1 में वे प्रजातियां शामिल हैं जो सबसे अधिक लुप्तप्राय हैं और जिनका किसी भी प्रकार का अंतरराष्ट्रीय व्यापार उनके अस्तित्व के लिए खतरा पैदा कर सकता है। इन प्रजातियों के वाणिज्यिक व्यापार पर सख्त प्रतिबंध है।

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