वार्षिक रिपोर्ट 2025–26 के अनुसार 2005-14 और 2014-24 के बीच मनी लॉन्ड्रिंग (धन शोधन) के मामलों में कुर्क की गई संपत्तियों में 23 गुना वृद्धि दर्ज की गई है।
- मनी लॉन्ड्रिंग यानी धन शोधन वह प्रक्रिया या क्रियाकलाप है जिसमें आपराधिक गतिविधियों से अर्जित धन को छिपाकर उसे वैध (कानूनी) वित्तीय प्रणाली में शामिल किया जाता है। यह प्रक्रिया आमतौर पर तीन चरणों में पूरी होती है, जिसके बाद यह धन कानूनी रूप से उपयोग योग्य बन जाता है। ये तीन चरण निम्नलिखित हैं:
- प्लेसमेंट: आपराधिक गतिविधियों से अर्जित धन को अलग करना।
- लेयरिंग: धन के स्रोत को छुपाने के लिए कई लेनदेन करना।
- इंटीग्रेशन: धन को वैध स्रोत से अर्जित किया हुआ दिखाना।
वार्षिक रिपोर्ट के अन्य मुख्य निष्कर्ष
- धन शोधन निवारण अधिनियम, 2002 (PMLA) के तहत प्रदर्शन: प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने मनी लॉन्ड्रिंग मामलों में लगभग 93–94% की उच्च दोषसिद्धि दर बनाए रखी है।
- भगोड़ा आर्थिक अपराधी अधिनियम, 2018 के तहत कार्रवाई: इस अधिनियम के तहत ₹2,178.34 करोड़ की संपत्तियों को जब्त किया गया है।
PMLA के तहत अभियोजन को पूरा करने में ED के समक्ष बाधाएं
- अभियोजन (मुकदमा) चलाने के लिए स्वीकृति की आवश्यकता: दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 197 (अब भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 218) के तहत अभियोजन के लिए पूर्व स्वीकृति जरूरी होती है, जिससे प्रक्रिया में देरी होती है।
- विशेष अदालतों की सीमित उपलब्धता: PMLA के तहत विशेष अदालतें मुख्यतः महानगरों और टियर-I शहरों में केंद्रित हैं, जिससे अन्य क्षेत्रों में मामलों के निपटान में कठिनाई होती है।
- वित्तीय जांच की जटिलता: मनी लॉन्ड्रिंग के मामलों में विस्तृत फोरेंसिक विश्लेषण की आवश्यकता होती है, जिसे एकत्र करने और न्यायालय में सिद्ध करने में काफी समय लगता है।
- अन्य देशों से सहयोग में देरी: अन्य देशों से जानकारी प्राप्त करने के लिए भेजे गए अनुरोध कानूनी जटिलताओं और कुछ देशों की अनिच्छा के कारण देर से पूरे होते हैं।
प्रवर्तन निदेशालय (ED) के बारे में
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