भारत को अपनी सॉफ्ट पावर कूटनीति में बौद्ध धर्म की भूमिका को पुनर्जीवित करने की आवश्यकता है | Current Affairs | Vision IAS

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In Summary

  • भारत की बौद्ध विरासत, जिसमें बोधगया और सारनाथ जैसे प्रमुख स्थल शामिल हैं, का उपयोग सौम्य कूटनीति के लिए कम किया जाता है, और वैश्विक बौद्ध पर्यटन का 1% से भी कम हिस्सा इसे प्राप्त होता है।
  • बाधाओं में एकीकृत ब्रांडिंग की कमी, संस्थागत देरी और अपर्याप्त बुनियादी ढांचा शामिल हैं, जो चीन जैसे क्षेत्रीय प्रतिस्पर्धियों के खिलाफ अपनी ऐतिहासिक वैधता का लाभ उठाने की भारत की क्षमता में बाधा डालते हैं।
  • सिफारिशों में एक समर्पित बौद्ध विरासत प्राधिकरण की स्थापना, अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डों और त्वरित वीजा के साथ बुनियादी ढांचे का आधुनिकीकरण और फेलोशिप के माध्यम से ज्ञान कूटनीति को बढ़ावा देना शामिल है।

In Summary

भारत की बौद्ध कूटनीति, भारत की सांस्कृतिक कूटनीति का एक महत्वपूर्ण पहलू है। हालांकि वर्तमान में कई बाधाओं के कारण इसका पूरा उपयोग नहीं हो पाया है।

भारत की बौद्ध विरासत

  • सभ्यता का केंद्र: भारत की पवित्र भौगोलिक भूमि बौद्ध धर्म की महत्वपूर्ण परिघटनाओं को सहेजी हुई है। जैसे कि गौतम बुद्ध को बोधगया में ज्ञान की प्राप्तिसारनाथ में उनका पहला उपदेश, और कुशीनगर में उनका महापरिनिर्वाण
  • वर्तमान में, विश्व के आठ सबसे महत्वपूर्ण बौद्ध स्थलों में से सात भारत में स्थित हैं। इनमें ऊपर बताए गए तीन स्थलों के अलावा नालंदा, श्रावस्ती, राजगीर और कपिलवस्तु शामिल हैं।
  • ऐतिहासिक संपर्क और सांस्कृतिक संबंध: यह परंपरा प्राचीन काल से हिमालय के पार के देशों से जुड़ी रही है। इसकी शुरुआत सम्राट अशोक द्वारा दूतों को भेजने से हुई और फिर कुषाण काल में महायान बौद्ध धर्म के विकास के साथ आगे बढ़ी।
  • तीर्थयात्रा: भारत थेरवाद बौद्ध परंपरा का प्रमुख स्रोत है। यह बौद्ध परंपरा श्रीलंका, जापान, थाईलैंड और दक्षिण कोरिया जैसे देशों के बौद्ध अनुयायियों की आध्यात्मिक पहचान का आधार है। यही परंपरा भारत में आने वाले अधिकांश बौद्ध पर्यटकों का आधार भी है।

सॉफ्ट पावर कूटनीति के लिए बौद्ध विरासत का कम उपयोग

  • वैश्विक बौद्ध पर्यटन बाजार: विश्व के कुल बौद्ध पर्यटकों में से केवल लगभग 1% भारत में आते हैं।
  • एकीकृत ब्रांडिंग का अभाव: भारत अपनी बौद्ध विरासत को एक समग्र राष्ट्रीय पहचान के रूप में प्रस्तुत करने के बजाय अलग-अलग पर्यटन स्थलों के रूप में देखता है।
  • संस्थागत और शैक्षणिक बाधाएं: नालंदा विश्वविद्यालय के पुनर्जीवन जैसे शैक्षणिक और सांस्कृतिक प्रयासों में देरी और घरेलू राजनीति के कारण बाधाओं का सामना करना पड़ा है। इससे भारत इस क्षेत्र में चीन जैसे क्षेत्रीय प्रतिस्पर्धियों से पीछे रह गया है।

आगे की राह

  • संस्थागत तंत्र की आवश्यकता: अलग से बौद्ध विरासत और तीर्थ यात्रा विकास प्राधिकरण बनाया जाए, जो बौद्ध विरासतों के संरक्षण, यात्रियों के परिवहन और बौद्ध विरासतों की ब्रांडिंग का समन्वय करे।
  • अवसंरचनाओं का आधुनिकीकरण: गया जैसे स्थानों पर वास्तविक अंतरराष्ट्रीय स्तर के हवाई अड्डे का विकास, त्वरित रेल नेटवर्क और बौद्ध तीर्थ यात्रियों के लिए आसान वीजा सुविधा की दिशा में प्रयास किए जाएं।
  • ज्ञान और सांस्कृतिक कूटनीति पर ध्यान: भारत को केवल सांकेतिक कदमों के बजाय पाली भाषा और बौद्ध अध्ययन में छात्रवृत्ति जैसी पहलों को बढ़ावा देना चाहिए।
  • क्षेत्रीय प्रतिस्पर्धा से निपटना: भारत बौद्ध धर्म की जन्मस्थली होने की अपनी ऐतिहासिक पहचान और दलाई लामा की उपस्थिति का उपयोग करके एशिया में बौद्ध कूटनीति में चीन के बढ़ते प्रभाव को प्रतिसंतुलित कर सकता है।
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नालंदा विश्वविद्यालय (Nalanda University)

प्राचीन भारत में एक अत्यंत प्रसिद्ध बौद्ध मठ और शिक्षण केंद्र, जो ज्ञान और शिक्षा का एक प्रमुख अंतरराष्ट्रीय केंद्र था। इसका पुनरुद्धार भारत की शिक्षा और सांस्कृतिक कूटनीति के प्रयासों का हिस्सा है।

ज्ञान और सांस्कृतिक कूटनीति (Knowledge and Cultural Diplomacy)

किसी देश द्वारा अपने ज्ञान, शिक्षा, कला और संस्कृति को बढ़ावा देकर अन्य देशों के साथ संबंध मजबूत करने और आपसी समझ बढ़ाने की प्रक्रिया। इसमें छात्रवृत्तियां, अकादमिक आदान-प्रदान और सांस्कृतिक कार्यक्रम शामिल हो सकते हैं।

बौद्ध विरासत और तीर्थ यात्रा विकास प्राधिकरण (Buddhist Heritage and Pilgrimage Development Authority)

एक प्रस्तावित संस्थागत तंत्र जिसका उद्देश्य भारत की बौद्ध विरासतों के संरक्षण, बौद्ध तीर्थ यात्रियों के लिए सुविधाओं के विकास और बौद्ध पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए एक एकीकृत दृष्टिकोण प्रदान करना है।

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