भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) ने वित्त वर्ष 2026 में कुल 53.1 बिलियन डॉलर की निवल बिक्री की है। यह वित्त वर्ष 2025 की 41.1 बिलियन डॉलर की बिक्री की तुलना में 12 बिलियन डॉलर अधिक है।
रुपये के मूल्यह्रास को रोकने के लिए RBI के अन्य उपाय
- लिक्विडिटी (तरलता) और स्वैप: रुपये की उपलब्धता बढ़ाने और बाजार में स्थिरता लाने के लिए RBI ने 5 बिलियन डॉलर का USD/INR खरीद/बिक्री स्वैप शुरू किया।
- विदेशी NDF और डेरिवेटिव पर सीमा: केंद्रीय बैंक घरेलू बैंकों को 'रुपया नॉन-डिलीवरेबल फॉरवर्ड (NDF) अनुबंध करने से रोक रहा है ताकि उन्हें विदेशी बाजारों की अस्थिरता से अलग रखा जा सके।
- रुपया नॉन-डिलीवरेबल फॉरवर्ड (NDF) एक विदेशी डेरिवेटिव अनुबंध है, जिसका उपयोग भारतीय रुपये में बिना वास्तविक लेनदेन किए हेजिंग या सट्टेबाजी के लिए किया जाता है। इसकी अवधि पूरी होने पर भारतीय रुपये का वास्तविक आदान-प्रदान नहीं होता।
- सट्टेबाजी आधारित कारोबार को रोकने के लिए बैंकों की 'नेट ओपन फॉरेक्स पोजीशन' को 100 मिलियन डॉलर पर सीमित कर दिया गया।

मुद्रा का मूल्यह्रास क्या है?
- परिभाषा: जब खुले बाजार में किसी देश की मुद्रा की कीमत विदेशी मुद्राओं के वनिस्पत कम हो जाती है, तो उसे 'मुद्रा का मूल्यह्रास' कहते हैं।
भारतीय रुपये के मूल्यह्रास के मुख्य कारण:
- वैश्विक आर्थिक कारक: जैसे होर्मुज जलसंधि संकट के कारण कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के पार चली जाना, और अमेरिकी फेडरल रिजर्व द्वारा ब्याज दरें बढ़ाना। इससे विदेशी मुद्रा की मांग बढ़ गई और रुपये के मूल्य में गिरावट दर्ज की गई।
- पूंजी का बाहर जाना: उदाहरण के लिए, 2026 में विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPIs) ने भारतीय शेयर बाज़ार में बिकवाली करके 2 लाख करोड़ रुपये से अधिक की राशि की निकासी कर दी।
- अन्य कारण: सोने के आयात का मूल्य दो वर्षों में लगभग दोगुना होकर 2025-26 में 72 बिलियन डॉलर हो गया। इसके अलावा, वित्त वर्ष 2026 में विदेश यात्रा के लिए उदारीकृत विप्रेषण योजना (लिबरलाइज्ड रेमिटेंस स्कीम: LRS ) के तहत 15 बिलियन डॉलर बाहर भेजे गए।