राष्ट्रीय हथकरघा दिवस (नेशनल हैंडलूम डे) प्रत्येक वर्ष 7 अगस्त को मनाया जाता है। यह दिवस 1905 में स्वदेशी आंदोलन की शुरुआत की स्मृति में मनाया जाता है।
- स्वदेशी आंदोलन ने विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार और देश में विनिर्मित वस्तुओं को अपनाने पर जोर दिया। इसने ‘आत्मनिर्भरता को राष्ट्रीय संप्रभुता के एक महत्वपूर्ण साधन’ के रूप में स्थापित किया।
भारत का हथकरघा उद्योग
- प्रमुख सरकारी पहलें:
- कार्यक्रम: राष्ट्रीय हथकरघा विकास कार्यक्रम (NHDP), लघु क्लस्टर विकास कार्यक्रम (SCDP) और मेगा क्लस्टर विकास कार्यक्रम बुनकरों के कल्याण, अवसंरचना विकास तथा उत्पादकता और बाजार से जोड़ने में मदद करते हैं।
- नीतिगत पहलें (केंद्रीय बजट 2026-27): आत्मनिर्भरता, आधुनिकीकरण और वैश्विक प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा देने के लिए राष्ट्रीय फाइबर योजना, वस्त्र विस्तार एवं रोजगार योजना, राष्ट्रीय हथकरघा एवं हस्तशिल्प कार्यक्रम तथा महात्मा गांधी ग्राम स्वराज पहल शुरू की गई हैं।
- वित्त-पोषण एवं कल्याण: हथकरघा विपणन सहायता, बुनकर मुद्रा योजना, प्रधानमंत्री जीवन ज्योति बीमा योजना (PMJJBY)/प्रधानमंत्री सुरक्षा बीमा योजना (PMSBY) बीमा तथा बुनकरों के बच्चों के लिए शिक्षा छात्रवृत्ति जैसी सुविधाएं प्रदान की जाती हैं।
- गुणवत्ता और बाजार तक पहुँच: हथकरघा मार्क, इंडिया हैंडलूम ब्रांड, GI संरक्षण, हथकरघा अधिनियम, 1985, GeM/इंडियाहैंडमेड पोर्टल और कुछ चयनित हथकरघा उत्पादों पर GST को घटाकर 5% करने जैसे उपाय किए गए हैं।

- महत्व: हथकरघा क्षेत्र संधारणीय, कम-कार्बन उत्सर्जन वाली और चक्रीय अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देता है। साथ ही, विश्व में लोकप्रिय भारत में निर्मित हस्तनिर्मित उत्पादों के माध्यम से ‘ब्रांड इंडिया’ को सुदृढ़ करता है।
- हथकरघा क्षेत्र की चुनौतियां:
- पावरलूम से नकल और नकली उत्पाद: पावरलूम से बने नकली/नकल किए गए उत्पाद असली हथकरघा उत्पादों और ‘ब्रांड इंडिया’ को नुकसान पहुँचाते हैं।
- कम आय और आर्थिक समस्याएँ: कम आय, मजदूरी में असमानता और कम ब्याज दर पर ऋण मिलने में कठिनाई बुनकरों की आजीविका को प्रभावित करती है।
- पारंपरिक करघे, कच्चे माल की अधिक लागत और कम उत्पादकता के कारण हथकरघा क्षेत्र की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता कम होती है।
- सीधे बाजार तक कम पहुंच के कारण कई बुनकर बिचौलियों पर निर्भर रहते हैं।
भारत के हथकरघा क्षेत्र की प्रगति प्रौद्योगिकी आधारित आधुनिकीकरण, ब्लॉकचेन जैसी ट्रेसबिलिटी तकनीकों के माध्यम से वैश्विक बाजार में ब्रांडिंग और सीधे डिजिटल बाजार से संपर्क पर निर्भर करती है। इससे कारीगरों की आय बढ़ाने में मदद मिलेगी।