भारत-अमेरिका व्यापार संबंधों के बारे में:
- भारत और अमेरिका के बीच एक ‘व्यापक वैश्विक रणनीतिक भागीदारी’ पहले से उपस्थित है।
- अमेरिका भारत का सबसे बड़ा निर्यात गंतव्य और उसके शीर्ष व्यापारिक भागीदारों में शामिल है।
- दोनों देशों ने 'मिशन 500' प्रारम्भ किया है। इसका लक्ष्य द्विपक्षीय व्यापार समझौते के माध्यम से द्विपक्षीय व्यापार को वर्ष 2030 तक 500 अरब अमेरिकी डॉलर तक पहुँचाना है।
रिपोर्ट के मुख्य बिंदुओं पर एक नजर
भारत-अमेरिका व्यापार में चुनौतियां | प्रमुख सिफारिशें |
टैरिफ दर की अनिश्चितता: अमेरिकी टैरिफ (3% से 18%) और नीतियों में निरंतर बदलावों से निर्यात प्रभावित होता है। | द्विपक्षीय व्यापार समझौते (BTA) को अंतिम रूप देना: टैरिफ और गैर-टैरिफ बाधाओं का समाधान करना चाहिए और 'मिशन 500' के लक्ष्य को प्राप्त करना चाहिए। |
गैर-टैरिफ बाधाएं (NTBs): सैनिटरी और फाइटोसैनिटरी (SPS) उपाय, प्रमाणन और सीमा शुल्क मानदंडों का अनुपालन निर्यात लागत बढ़ाते हैं। | प्रतिस्पर्धात्मकता में वृद्धि करना: उत्पादन से संबद्ध प्रोत्साहन (PLI) योजना, मेक इन इंडिया, लॉजिस्टिक्स, निर्यात अवसंरचना और नवाचार प्रणाली को सुदृढ़ बनाना चाहिए |
MSMEs की समस्याएं: वित्तीय संसाधनों की कमी और नियमों के अनुपालन करने की कम क्षमता की वजहों से वैश्विक मूल्य श्रृंखला (GVC) में इनकी भागीदारी सीमित है। | MSMEs को सहायता: निर्यात के लिए वित्तीय सहायता; गुणवत्ता प्रमाणन, नियमों का पालन करने में सहायता और वैश्विक मूल्य श्रृंखला (GVC) से जुड़ने के अवसरों का विस्तार करना चाहिए। |
बाजार पर अधिक निर्भरता और कई क्षेत्रकों से निर्यात में गिरावट दर्ज: अमेरिकी बाजार पर अत्यधिक निर्भरता और श्रम-गहन क्षेत्रकों से निर्यातों में गिरावट दर्ज की गई है। | व्यापार में विविधता लाना: निर्यात के बाजारों, उत्पादों और आपूर्ति श्रृंखलाओं का विस्तार करना तथा निर्यात वाले प्रमुख क्षेत्रकों (सेक्टर्स) को और सुदृढ़ बनाना चाहिए। |
कम तकनीकी क्षमता और अधिक लागत: अनुसंधान एवं विकास (R&D) कम होने, सीमित मूल्य संवर्धन, अधिक लॉजिस्टिक्स लागत और वस्तुओं की कीमतों में उतार-चढ़ाव से प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता कम होती है। | प्रौद्योगिकी और निवेश को बढ़ावा देना: AI, सेमीकंडक्टर और स्वच्छ ऊर्जा के क्षेत्र में सहयोग बढ़ाना तथा प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) को आकर्षित करना चाहिए। |