चिह्नित NBFC-UL पर अब कम से कम 5 वर्षों तक कड़े विनियामक नियम लागू होंगे। इनमें पहचान के 3 वर्षों के भीतर अनिवार्य रूप से शेयर बाजार में सूचीबद्ध (लिस्टिंग) होना भी शामिल है।
NBFC के लिए स्केल-आधारित विनियमन के बारे में:
- RBI द्वारा लागू किया गया, यह फ्रेमवर्क गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (NBFCs) को उनकी प्रणालीगत महत्ता, आकार और जोखिम के स्तर के आधार पर चार अलग-अलग स्तरों (Layers) में वर्गीकृत करता है।

- बेस लेयर (NBFC-BL): इसमें ₹1,000 करोड़ से कम परिसंपत्ति वाली और जमा नहीं स्वीकार करने वाली एनबीएफसी (NBFC-ND) शामिल हैं।
- इसमें पीयर-टू-पीयर (P2P) लेंडिंग प्लेटफॉर्म, अकाउंट एग्रीगेटर्स (AA), और नॉन-ऑपरेटिव फाइनेंशियल होल्डिंग कंपनियां जैसी विशिष्ट संस्थाएं शामिल हैं।
- मिडिल लेयर (NBFC-ML): इसमें जमा स्वीकार करने वाली सभी NBFCs शामिल होती हैं, चाहे उनका परिसंपत्ति आकार कुछ भी हो। इसके अलावा, ₹1,000 करोड़ या उससे अधिक की परिसंपत्ति वाली जमा-नहीं स्वीकार करने वाली NBFCs भी इस स्तर में आती हैं।
- इनमें इंफ्रास्ट्रक्चर डेब्ट फंड NBFC, कोर इन्वेस्टमेंट कंपनी (CIC), हाउसिंग फाइनेंस कंपनी और NBFC-अवसंरचना वित्त कंपनी जैसी विशेष संस्थाएँ भी शामिल हैं।
- NBFC क्षेत्र की कुल परिसंपत्तियों में NBFC-ML की हिस्सेदारी सबसे अधिक, 64.6% है।
- अपर लेयर (NBFC-UL): इसमें RBI द्वारा प्रतिवर्ष पहचाने जाने वाली ऐसी NBFCs शामिल हैं, जिनकी परिसंपत्ति का आकार ₹1,00,000 करोड़ और उससे अधिक है।
- टॉप लेयर (NBFC-TL): आदर्श रूप से यह लेयर खाली रहना चाहिए, लेकिन यदि किसी विशेष NBFC-UL से उत्पन्न संभावित प्रणालीगत जोखिम में काफी वृद्धि होती है, तो ऐसी NBFC-UL को टॉप लेयर में स्थानांतरित कर दिया जाएगा।