सुर्ख़ियों में क्यों?
हाल ही में संयुक्त राज्य अमेरिका के विदेश मंत्री मार्को रुबियो (Marco Rubio) ने भारत का दौरा किया। इस यात्रा का उद्देश्य हाल के समय में तनावपूर्ण हुए भारत–अमेरिका द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत करना था।
अन्य संबंधित तथ्य
- पिछले कुछ वर्षों में भारत–अमेरिका संबंधों में कुछ तनाव देखने को मिला है। इसका प्रमुख कारण वर्तमान अमेरिकी प्रशासन द्वारा अपनाई गई कुछ नीतियाँ हैं, जैसे भारतीय वस्तुओं पर शुल्क (Tariffs) लगाना तथा अन्य संरक्षणवादी आर्थिक कदम।
भारत–अमेरिका संबंधों में सहयोग के प्रमुख क्षेत्र

- हिंद-प्रशांत एवं क्षेत्रीय सुरक्षा: भारत और अमेरिका के रणनीतिक सहयोग का सबसे बड़ा आधार चीन के बढ़ते प्रभाव एवं उसकी क्षेत्रीय विस्तारवादी नीतियों को लेकर साझा चिंता है।
- दोनों देश क्वाड (Quad) जैसे मंचों के माध्यम से समुद्री सुरक्षा को बढ़ावा देने के लिए निकट रूप से सहयोग करते रहे हैं।
- रक्षा सहयोग एवं सह-उत्पादन: अमेरिका ने भारत को "मेजर डिफेंस पार्टनर" का दर्जा प्रदान किया है। दोनों देशों की रक्षा साझेदारी अब केवल रक्षा उपकरणों की खरीद तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सह-विकास एवं सह-उत्पादन की दिशा में आगे बढ़ रही है। उदाहरण: INDUS-X पहल।
- अमेरिका के साथ हस्ताक्षरित प्रमुख बुनियादी समझौतों में LEMOA, COMCASA और BECA शामिल हैं।.
- महत्वपूर्ण प्रौद्योगिकी एवं नवाचार: दोनों देश TRUST (ट्रांसफॉर्मिंग द रिलेशनशिप यूटिलाइजिंग स्ट्रेटेजिक टेक्नोलॉजी) पहल के अंतर्गत रणनीतिक प्रौद्योगिकियों में सहयोग कर रहे हैं। इसके तहत शामिल प्रमुख क्षेत्र: कृत्रिम बुद्धिमत्ता, सेमीकंडक्टर, क्वांटम कंप्यूटिंग, दूरसंचार हैं।
- मजबूत आपूर्ति शृंखला एवं महत्वपूर्ण खनिज: भारत और अमेरिका चीन पर निर्भरता कम करने के उद्देश्य से वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं का पुनर्गठन कर रहे हैं। दोनों देश क्रिटिकल मिनरल्स फ्रेमवर्क और इंडो-पैसिफिक इकोनॉमिक फ्रेमवर्क (IPEF) के माध्यम से महत्वपूर्ण खनिजों एवं सुरक्षित आपूर्ति शृंखलाओं पर सहयोग कर रहे हैं।
- स्वच्छ ऊर्जा एवं जलवायु परिवर्तन: दोनों देशों के बीच रणनीतिक स्वच्छ ऊर्जा साझेदारी (SCEP) के अंतर्गत सहयोग जारी है। स्वच्छ ऊर्जा आपूर्ति शृंखलाओं के विकास हेतु लगभग 1 बिलियन अमेरिकी डॉलर के बहुपक्षीय वित्तपोषण को आकर्षित करने के लिए एक रोडमैप भी जारी किया गया है।
- अंतरिक्ष सहयोग : भारत और अमेरिका के बीच ISRO एवं NASA के माध्यम से नागरिक अंतरिक्ष सहयोग अत्यंत मजबूत है। उदाहरण के लिए, NASA-ISRO सिंथेटिक एपर्चर रडार (NISAR) मिशन।
- आर्थिक और व्यापारिक साझेदारी: अमेरिका भारत के सबसे बड़े व्यापारिक साझेदारों में से एक है।
- ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करना: हाल के वर्षों में, अमेरिका भारत को लिक्विफाइड नेचुरल गैस (LNG) की आपूर्ति करने वाले सबसे बड़े देशों में से एक बनकर उभरा है।
भारत-अमेरिका संबंधों में प्रमुख बाधाएं
- दंडात्मक शुल्क (Tariffs) और व्यापारिक दबाव: वर्ष 2025 में, अमेरिका ने कुछ भारतीय निर्यातों पर 50% का शुल्क लगा दिया था; हालांकि, बाद में दोनों पक्षों के बीच हुए एक अंतरिम व्यापार समझौते के तहत इसे कम कर दिया गया।
- इसके कारण अमेरिका को होने वाले भारतीय निर्यात में गिरावट आई है।
- ऊर्जा सुरक्षा और रूस से तेल का आयात: भारत द्वारा रियायती दरों पर रूस से कच्चे तेल की निरंतर खरीद दोनों देशों के बीच विवाद का एक प्रमुख बिंदु बन गई है।
- अमेरिका का मानना है कि इन खरीदों से रूस को आर्थिक सहायता मिलती है, जिससे उसके युद्ध प्रयासों को बल मिलता है। इसी कारण अमेरिका भारत पर रूस से ऊर्जा निर्भरता कम करने के लिए आर्थिक दबाव बना रहा है।
- पाकिस्तान के साथ अमेरिका की बढ़ती निकटता: अमेरिका ने हाल ही में पाकिस्तान के साथ अपने राजनयिक और सैन्य संपर्कों को पुनः मजबूत किया है।
- रणनीतिक स्वायत्तता बनाम गठबंधन की अपेक्षाएं: अमेरिका अक्सर चाहता है कि भारत उसकी भूराजनीतिक नीतियों एवं रणनीतिक गुटों के अनुरूप कार्य करे।
- इसके विपरीत, भारत "बहु-संरेखण (Multi-alignment)" की नीति का पालन करता है। भारत एक ओर क्वाड जैसे पश्चिम-समर्थित मंचों का सदस्य है, वहीं दूसरी ओर ब्रिक्स एवं शंघाई सहयोग संगठन जैसे गैर-पश्चिमी मंचों में भी सक्रिय भागीदारी करता है। इसका उद्देश्य अपनी रणनीतिक स्वायत्तता एवं नीति-निर्माण की स्वतंत्रता बनाए रखना है।
- चीन की नीति में परिवर्तन: हाल ही में अमेरिका और चीन ने "रणनीतिक स्थिरता पर आधारित रचनात्मक संबंध" विकसित करने पर सहमति व्यक्त की। यह संबंध निष्पक्षता और पारस्परिकता के सिद्धांतों पर आधारित होगा।
- आव्रजन एवं वीजा नीतियाँ: अमेरिका द्वारा वीज़ा नियमों को अधिक कठोर बनाया जा रहा है। इसका सबसे अधिक प्रभाव H-1B वीजा पर कार्यरत भारतीय आईटी पेशेवरों एवं कुशल कर्मचारियों पर पड़ रहा है।
- प्रतिबंधों की आशंका: भारत द्वारा रूस से S-400 वायु रक्षा प्रणाली की खरीद पर अमेरिका ने चिंता व्यक्त की है। अमेरिका का मानना है कि यह खरीद 'काउंटरिंग अमेरिकाज एडवर्सरीज थ्रू सैंक्शंस एक्ट' (CAATSA) के अंतर्गत प्रतिबंधों का कारण बन सकती है।
भारत-अमेरिका संबंधों को बेहतर बनाने की रणनीतियां
- द्विपक्षीय व्यापार समझौते (BTA) को अंतिम रूप देना: दोनों देशों को एक व्यापक द्विपक्षीय व्यापार समझौता करना चाहिए। इससे व्यापारिक शुल्क (Tariffs) कम होंगे, बाजार तक पहुँच बेहतर होगी और व्यापार अधिक स्थिर, पूर्वानुमेय एवं पारस्परिक रूप से लाभकारी बनेगा।
- H-1B वीजा प्रतिबंधों में छूट: अमेरिका भारतीय आईटी पेशेवरों, शोधकर्ताओं आदि के लिए वीजा प्रक्रियाओं को सुगम और सरल बना सकता है।
- CAATSA के तहत छूट देना: रक्षा संबंधों को मजबूत करने और क्षेत्रीय खतरों का मुकाबला करने के लिए CAATSA के तहत भारत के लिए दीर्घकालिक छूट प्राप्त करने हेतु भारतीय-अमेरिकियों के प्रभाव का उपयोग किया जा सकता है।

- ब्रिज पावर (सेतु शक्ति) के रूप में कार्य करना: भारत, अमेरिका और चीन की तरह गहन औद्योगिक परस्पर निर्भरता में नहीं बँधा है और न ही यह किसी पदानुक्रम आधारित भू-राजनीतिक वर्चस्व की नीति अपनाता है।
- इसलिए भारत स्वयं को एक "ब्रिज पावर (Bridge Power)" अर्थात दो पक्षों को जोड़ने वाली शक्ति के रूप में स्थापित कर सकता है। इसके लिए उसे ऐसा रुख अपनाना होगा जो गैर-पश्चिमी तो हो, लेकिन पश्चिमी-विरोधी न हो।
- संस्थागत संवाद और व्यावहारिक सहयोग को बनाए रखना: उच्च-स्तरीय संस्थागत माध्यमों, जैसे कि '2+2' मंत्रिस्तरीय वार्ता के माध्यम से मतभेदों को कम करके संबंधों को स्थिर किया जा सकता है। यह अमेरिका-पाकिस्तान संबंधों, मध्य पूर्व में दोनों देश के हित जैसे भिन्न भू-राजनीतिक हितों को प्रबंधित करने में मदद करेगा।
- इससे अलग-अलग भू-राजनीतिक हितों (जैसे अमेरिका-पाकिस्तान के बीच बढ़ती निकटता, मध्य पूर्व में हित आदि) को प्रबंधित करने में मदद मिलेगी।
निष्कर्ष
भारत-अमेरिका संबंध रक्षा, प्रौद्योगिकी, ऊर्जा और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में मजबूत रणनीतिक निकटता को दर्शाते हैं। हालांकि, इसके साथ ही व्यापार, वीजा, प्रतिबंध और भू - राजनीतिक प्राथमिकताओं में लगातार बने रहने वाले मतभेद कभी-कभी तनाव उत्पन्न कर देते हैं। भविष्य में, दीर्घकालिक स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए संस्थागत वार्ता, एक संतुलित व्यापार ढांचे, रणनीतिक स्वायत्तता के प्रति अधिक सम्मान, और उभरती प्रौद्योगिकियों व लचीली आपूर्ति श्रृंखलाओं में गहरे सहयोग के माध्यम से इस साझेदारी को और मजबूत किया जाना चाहिए।