वैकल्पिक विवाद समाधान (ADR) प्रणाली पर संसदीय समिति की रिपोर्ट | Current Affairs | Vision IAS

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कार्मिक, लोक शिकायत, विधि और न्याय संबंधी विभागीय संसदीय स्थायी समिति ने भारत में वैकल्पिक विवाद समाधान (Alternative Dispute Resolution: ADR) प्रणाली पर अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की है।

  • ADR ऐसी व्यवस्था है, जिसमें न्यायालय के बाहर विवादों का समाधान शीघ्र, कम खर्च में और कम विवादपूर्ण तरीके से किया जाता है। इसके प्रमुख माध्यम हैं; मध्यस्थता (Mediation)पंचाट (Arbitration)सुलह (Conciliation)समझौता (Negotiation) और लोक अदालत

प्रमुख मुद्दे और समिति के सुझाव

प्रमुख मुद्दे

समिति के सुझाव

न्यायालयों में लंबित मामलों का बढ़ता बोझ: वर्तमान में लंबित मामले 6 करोड़ से अधिक हैं।

ADR को अधिक प्रभावी बनाया जाए। इसके लिए संस्थागत क्षमता, क्षेत्रक-विशिष्ट व्यवस्था, प्रदर्शन मानक और जवाबदेही तंत्र को सुदृढ़ किया जाए। 

संस्थान-पूर्व मध्यस्थता और निपटान (प्री-इंस्टीट्यूशन मेडिएशन एंड सेटलमेंट: PIMS) का कम उपयोग: 5 वर्षों में केवल लगभग 4,000 मामलों का निपटान किया गया।

PIMS को अनिवार्य बनाया जाए। बिना उचित कारण मध्यस्थता से इनकार करने या जानबूझकर सहयोग न करने पर लागत/जुर्माने का प्रावधान किया जाए।

भारत अंतर्राष्ट्रीय मध्यस्थता केंद्र (IIAC) का कम उपयोग: स्थापना के बाद से केवल 17 मामले ही निपटाए गए।

लक्षित प्रचार (आउटरीच) और हितधारकों के साथ बेहतर संवाद किया जाए। संस्थागत सुधारों के माध्यम से इसमें आने वाले मामलों की संख्या बढ़ाई जाए और इसे वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनाया जाए।

पंचाट में न्यायिक हस्तक्षेप अधिक होना:  न्यायालयों का अत्यधिक हस्तक्षेप पंचाट प्रक्रिया में देरी करता है। इससे पंचाट की स्वतंत्रता भी प्रभावित होती है।

न्यायिक हस्तक्षेप की स्पष्ट सीमाएँ तय की जाएँ तथा संस्थागत नियमों और प्रक्रियाओं को मजबूत किया जाए।

ऑनलाइन विवाद समाधान (ODR) का सीमित उपयोग: भारत में ऑनलाइन विवाद समाधान प्रणाली का अभी पर्याप्त विस्तार नहीं हुआ है।

न्यूनतम डिजिटल मानक तय किए जाएँ, डिजिटल अवसंरचना को सुदृढ़ किया जाए। साथ में, आसान और उपयोगकर्ता-अनुकूल ODR प्लेटफॉर्म को बढ़ावा दिया जाए।

ADR पेशेवरों की कमजोर व्यवस्था

ADR के लिए मान्यता/प्रत्यायन, मानकीकृत प्रशिक्षण और मान्य योग्यताओं की व्यवस्था विकसित की जाए। ADR को विधि शिक्षा से जोड़ा जाए।

राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण (NALSA) में वित्त और कर्मचारियों की कमी: NALSA में 45 में से 16 पद खाली हैं। आवश्यक बजट लगभग ₹1,058.87 करोड़ की तुलना में केवल ₹550 करोड़ आवंटित किए गए हैं।

रिक्त पदों को भरा जाए, कर्मचारियों की संख्या बढ़ाई जाए, पर्याप्त बजटीय सहायता देकर विधिक सहायता और न्याय तक पहुँच को सुदृढ़ किया जाए।

लोक अदालतों में मामलों के निपटारे की गुणवत्ता: बड़े पैमाने पर मामलों के निपटारे से यह चिंता उत्पन्न होती है कि कहीं मामलों की संख्या को निष्पक्ष और गुणवत्तापूर्ण समाधान से अधिक प्राथमिकता तो नहीं दी जा रही।

मामलों के चयन और समझौते की प्रक्रिया के लिए स्पष्ट एवं सरल दिशा-निर्देश बनाए जाएँ, समझौतों के परिणामों का लंबे समय तक डेटा के माध्यम से मूल्यांकन किया जाए।

मध्यस्थता अधिनियम को लागू करने में देरी: चरणबद्ध तरीके से लागू करने के कारण प्रमुख प्रावधानों (जैसे धारा 63) का क्रियान्वयन रुक गया है क्योंकि भारतीय मध्यस्थता परिषद (MCI) अभी तक पूरी तरह कार्यात्मक नहीं है।

MCI की स्थापना और उसे पूरी तरह कार्यात्मक बनाने की प्रक्रिया तेज की जाए, इसके विनियामक ढांचे को शीघ्र अंतिम रूप दिया जाए।

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भारतीय मध्यस्थता परिषद (Arbitration Council of India: MCI)

यह मध्यस्थता के क्षेत्र में गुणवत्ता, मानकीकरण और नियमों को बढ़ावा देने के लिए स्थापित एक निकाय है। यह मध्यस्थता संस्थानों को मान्यता देने और मध्यस्थों की सूची बनाने का कार्य करता है।

मध्यस्थता अधिनियम (Arbitration Act)

यह वह कानून है जो भारत में पंचाट (arbitration) की प्रक्रिया को नियंत्रित करता है, जिसमें पंचाट की नियुक्तियों, प्रक्रिया, शक्तियों और पुरस्कारों की प्रवर्तनीयता से संबंधित प्रावधान शामिल हैं।

राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण (National Legal Services Authority: NALSA)

यह भारतीय संविधान के तहत स्थापित एक वैधानिक निकाय है जिसका उद्देश्य समाज के कमजोर वर्गों को मुफ्त और सक्षम विधिक सेवाएं प्रदान करना तथा न्याय तक पहुँच को सुगम बनाना है।

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