सुप्रीम कोर्ट की समिति द्वारा खारिज किए जाने के बावजूद भी भागीरथी ESZ में बाईपास परियोजना को मंजूरी दी गई | Current Affairs | Vision IAS
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ESC

हाल ही में, उत्तराखंड सरकार ने नटाला बाईपास प्रोजेक्ट को मंजूरी दी है, जबकि पहले सुप्रीम कोर्ट की उच्चाधिकार प्राप्त समिति (HPC) ने इसे पर्यावरणीय और सामाजिक कारणों से खारिज कर दिया था। यह परियोजना संवेदनशील भागीरथी ईको-सेंसिटिव ज़ोन (ESZ) में अंतर्गत आती है।

इस परियोजना से संबंधित चिंताएं

  • रक्षा मंत्रालय ने इस परियोजना को सामरिक रूप से महत्वपूर्ण बताया था, फिर भी परियोजना के पर्यावरणीय प्रभाव को लेकर चिंताएं बनी हुई हैं।
  • हाल ही में, धराली में आई आकस्मिक बाढ़ (फ्लैश फ्लड) और विशेषज्ञों के विश्लेषण से यह स्पष्ट संकेत मिलता है कि प्रस्तावित बाईपास मार्ग में ढलान अस्थिरता (भूस्खलन) एवं धंसाव की आशंका है। साथ ही, बाढ़ के दौरान इसका एक हिस्सा पहले ही ढह चुका है।
  • यह अनुमोदन विशेष रूप से संवेदनशील पारिस्थितिकी क्षेत्रों में राष्ट्रीय सुरक्षा/ सामरिक परियोजना और पर्यावरण संरक्षण के नियमों के बीच संभावित टकराव को उजागर करता है।

विकास बनाम पर्यावरण 

  • विकासात्मक समानता के लिए तर्क: गरीबी और भुखमरी को कम करने के लिए आर्थिक विकास महत्वपूर्ण है; बढ़ती जनसंख्या के लिए संसाधनों का अधिक उपयोग आवश्यक है; अगर लोग ही न रहें तो पर्यावरण बचाना निरर्थक है आदि।
  • पर्यावरणीय समता के लिए तर्क: यदि जीवन को बनाए रखने वाले पर्यावरण को सीमा से परे नष्ट कर दिया जाए, तो विकास निरर्थक हो जाता है; यहां तक कि छोटी-छोटी विकासात्मक गतिविधियां भी मिलकर बड़े पर्यावरणीय क्षरण का कारण बन सकती हैं, आदि।
  • पर्यावरणीय क्षरण के कारक: इसमें आर्थिक विकास संबंधी अनिवार्यताएं, विकास संबंधी विशाल परियोजनाएं, औद्योगिक क्षेत्र व विशेष आर्थिक क्षेत्र, शहरीकरण, पर्यावरणीय प्रभाव आकलन को दरकिनार कर पर्यावरणीय मंजूरी में तेजी लाने जैसी नीतिगत खामियां, आदि शामिल हैं।

सतत विकास दृष्टिकोण

  • पारिस्थितिक दृष्टिकोण: यह बायोसेंट्रिज़्म पर आधारित, जिसमें मनुष्य को प्रकृति का प्रधान नहीं बल्कि उसका हिस्सा माना जाता है। इसमें माना जाता है कि मनुष्य को प्रकृति की सीमाओं में रहते हुए केवल गुणवत्तापूर्ण (Qualitative) विकास करना चाहिए।
  • मजबूत संधारणीय विकास: इसके तहत यह तर्क दिया जाता है कि आर्थिक विकास के साथ-साथ पर्यावरण संरक्षण सुनिश्चित करना अनिवार्य है। इसके लिए विनियमन, हस्तक्षेप और सामुदायिक भागीदारी के माध्यम से पर्यावरणीय संसाधनों को बनाए रखने पर ध्यान केंद्रित किया जाता है।
  • कमजोर संधारणीय विकास: इसका उद्देश्य आर्थिक विकास को पर्यावरणीय मुद्दों के साथ एकीकृत करना है। इसमें आर्थिक विकास को मुख्य लक्ष्य माना जाता है, लेकिन पर्यावरण को भी पूरी तरह से नजरअंदाज नहीं किया जाता है। हालांकि, नई प्रक्रियाओं और हरित करों जैसे नीतिगत साधनों का उपयोग करके पर्यावरणीय हानि को पूरी तरह से रोकने की बजाय उसे नियंत्रित करने या उसकी भरपाई करने की कोशिश की जाती है।
  • ट्रेडमिल दृष्टिकोण: यह सतत विकास को संधारणीय आर्थिक विकास के समान मानता है। इसमें अक्सर पर्यावरणीय प्रभावों की अनदेखी की जाती है और माना जाता है कि मानव बुद्धि एवं तकनीक पर्यावरणीय समस्याओं का समाधान कर सकती है।
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