खाद्य एवं कृषि संगठन (FAO) ने “खाद्य एवं कृषि के लिए विश्व के भूमि और जल संसाधनों की स्थिति (SOLAW) 2025” रिपोर्ट जारी की | Current Affairs | Vision IAS
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रिपोर्ट में टिकाऊ कृषि को बढ़ावा देने के लिए भूमि, मृदा और जल संसाधनों की क्षमता पर प्रकाश डाला गया है, तथा भूमि क्षरण और जल उपयोग जैसी चुनौतियों पर जोर दिया गया है, तथा टिकाऊ प्रथाओं और संस्थागत समर्थन की वकालत की गई है।

In Summary

SOLAW रिपोर्ट प्रत्येक दो वर्षों में जारी की जाती है। SOLAW 2025 रिपोर्ट भूमि, मृदा और जल संसाधनों की अदृश्य और अप्रयुक्त क्षमता के उपयोग पर केंद्रित है, ताकि संधारणीय कृषि उत्पादन, खाद्य सुरक्षा, अनुकूलन (रेसिलिएंस) और पारिस्थितिकी-तंत्र सेवाओं में वृद्धि की जा सके।

रिपोर्ट के मुख्य बिन्दुओं पर एक नजर

  • मुख्य चुनौतियां: वर्ष 2050 तक विश्व की आबादी में वृद्धि के कारण कृषि को 2012 की तुलना में 50% अधिक खाद्य, चारा और फाइबर का उत्पादन करना पड़ेगा। साथ ही, 25% अधिक ताजा जल की जरुरत पड़ेगी। 
    • रिपोर्ट में कहा गया है कि कृषि भूमि के  विस्तार की अब संभावना नहीं रह गई है।
    • मानव-जनित भूमि-निम्नीकरण (Land degradation) का 60% से अधिक प्रभाव सीधे कृषि भूमि पर पड़ता है। साथ ही, वैश्विक ताजे जल संसाधनों का 70% से अधिक हिस्सा अकेले कृषि क्षेत्रक द्वारा उपयोग कर लिया जाता है।
    • गहन कृषि पद्धतियाँ और रसायनों का अत्यधिक उपयोग बढ़ते प्रदूषण के लिए जिम्मेदार हैं। साथ ही, ये भूमि, मृदा और जल संसाधनों में कमी का कारण भी हैं।  
  • संधारणीय कृषि उत्पादन की संभावनाएं: 
    • भूमि उत्पादकता बढ़ाना: इसमें निम्नलिखित उपाय शामिल हैं-
      • वर्तमान वास्तविक उपज और उपज-क्षमता के बीच के अंतर (yield gap) को कम करना, 
      • स्थानीय दशाओं के अनुकूल जलवायु सहिष्णु फसलों की खेती को बढ़ावा देना, और,
      • संधारणीय कृषि-फसल प्रबंधन पद्धतियों को अपनाना।  
    • वर्षा सिंचित (Rainfed) कृषि की उत्पादकता बढ़ाना: यह निम्नलिखित रूप से संभव है:
      • संरक्षण कृषि (conservation agriculture) को बढ़ावा देकर,  
      • सूखा-सहिष्णु तकनीकों; जैसे—मृदा में नमी का संरक्षण, अलग-अलग फसलों की खेती (विविधीकरण) को अपनाकर, आदि ।
        • उदाहरण के लिए: गोरखपुर (भारत) में "सूक्ष्मजीवों के प्रभावी प्रबंधन” (Management of effective microorganisms) से किसानों की आय में अधिक वृद्धि दर्ज की गई।
    • एकीकृत कृषि-पद्धतियां: जैसे कृषि-वानिकी (Agroforestry), घूर्णी चराई (Rotational grazing), चारा फसल में सुधार, तथा धान की खेती के साथ मछली पालन (rice–fish farming) जैसे मॉडल्स को अपनाना।
    • संस्थाओं द्वारा क्षमता निर्माण: यह आधुनिक कृषि-विस्तार सेवाओं के माध्यम से किया जा सकता है। इसमें FAO के फार्मर फील्ड स्कूल (FFS) जैसे प्रशिक्षण कार्यक्रम शामिल हैं।
      • उदाहरण के लिए: आंध्र प्रदेश में फार्मर फील्ड स्कूल कार्यक्रम ने समुदाय द्वारा प्रबंधित प्राकृतिक खेती (नेचुरल फार्मिंग) पहल को बढ़ावा दिया है। इससे स्थानीय पारिस्थितिक तंत्र और आजीविका में सुधार हुआ है।
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