पारंपरिक भू-राजनीति की सीमाएं अब भू-अर्थशास्त्र के प्रभाव से पुनः परिभाषित हो रही हैं। इस वजह से भारत को नई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है।
- भू-राजनीति (Geopolitics): यह भौगोलिक स्थिति और अवस्थिति तथा सैन्य शक्ति जैसे पारंपरिक कारकों के माध्यम से शक्ति का निर्धारण है।
- भू-अर्थशास्त्र (Geo-economics): यह राष्ट्रीय हितों की सुरक्षा और उन्हें मजबूत करने तथा लाभकारी भू-राजनीतिक परिणाम प्राप्त करने के लिए आर्थिक साधनों (व्यापार, प्रतिबंध आदि) का उपयोग है।
भू-अर्थशास्त्र किस प्रकार भू-राजनीति को आकार दे रहा है?
- ऊर्जा एवं संसाधन कूटनीति का उपयोग: उदाहरण के लिए- संयुक्त राज्य अमेरिका ने सेमीकंडक्टर, AI और अति-महत्वपूर्ण खनिजों (क्रिटिकल मिनरल्स) की निरंतर आपूर्ति सुनिश्चित करने हेतु हाल ही में “पैक्स सिलिका” पहल शुरू की। इस नौ-सदस्यीय समूह से भारत को बाहर रखा गया है।
- ‘परस्पर निर्भरता’ का हथियार के रूप में उपयोग करना: उदाहरण के लिए-संयुक्त राज्य अमेरिका द्वारा आर्थिक प्रतिबंधों का उपयोग। जैसे कि रूसी बैंकों को स्विफ्ट (SWIFT) प्रणाली से बाहर कर दिया गया है।
- सामरिक उपकरण के रूप में व्यापार नीति का उपयोग: उदाहरण के लिए- संयुक्त राज्य अमेरिका–चीन व्यापार युद्ध। इसमें सेमीकंडक्टर जैसी प्रौद्योगिकियों पर प्रभुत्व स्थापित करना प्रमुख कारक है।
- भू-आर्थिक स्तर पर विश्व का विखंडन: उदाहरण के लिए: यूरोपीय संघ के कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म (CBAM) के तहत उत्सर्जन कटौती का बोझ ग्लोबल साउथ के देशों पर डाल दिया गया है।
भू-अर्थशास्त्र के क्षेत्र में भारत की प्रमुख चुनौतियां
- खनिज संसाधन एवं प्रौद्योगिकी की कमी: ऑस्ट्रेलिया के समान भूवैज्ञानिक संभावनाओं के बावजूद, भारत ने अपने निक्षेपित खनिज संसाधनों का केवल 25–30% ही अन्वेषण किया है। इस कारण लिथियम जैसे अति-महत्वपूर्ण खनिजों के लिए भारत 100% आयात पर निर्भर है।
- अनुसंधान एवं विकास (R&D) पर कम व्यय और प्रौद्योगिकी-अनुकूल परिवेश का अभाव: भारत अपनी GDP का केवल 0.6–0.7% ही R&D पर व्यय करता है। यह चीन और संयुक्त राज्य अमेरिका (2.5–3%) जैसे देशों की तुलना में काफी कम है।
- नीति एवं शासन के स्तर पर कमियां: जैसे कि नौकरशाही संबंधी लालफीताशाही के कारण खनिज अन्वेषण में निजी क्षेत्र की भागीदारी और निवेश को प्रोत्साहन नहीं मिल पाता है।
भारत के लिए आगे की राह
|