उच्चतम न्यायालय ने न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा को पद से हटाने के लिए लोक सभा अध्यक्ष द्वारा जांच समिति के गठन के निर्णय को बरकरार रखा | Current Affairs | Vision IAS
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In Summary

  • अदालत ने फैसला सुनाया है कि एक सदन में न्यायाधीश को हटाने के प्रस्ताव को खारिज करने से दूसरे सदन को जांच करने से नहीं रोका जा सकता है।
  • निष्कासन के आधार सिद्ध दुर्व्यवहार और अक्षमता हैं; प्रक्रिया न्यायाधीश जांच अधिनियम, 1968 द्वारा शासित होती है।
  • न्यायाधीश को हटाने के लिए दोनों सदनों में विशेष बहुमत और राष्ट्रपति के आदेश की आवश्यकता होती है; आज तक किसी को भी नहीं हटाया गया है।

In Summary

न्यायालय ने यह टिप्पणी की कि किसी एक सदन (अर्थात लोक सभा या राज्य सभा) में न्यायाधीश के खिलाफ प्रस्ताव का खारिज होना, दूसरे सदन को जांच आगे बढ़ाने और जांच समिति गठित करने के लिए अक्षम नहीं बनाता है।

न्यायाधीशों को पद से हटाने से संबंधित संवैधानिक प्रावधान

  • अनुच्छेद 124 और 218: क्रमशः उच्चतम न्यायालय तथा उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों को पद से हटाने से संबंधित हैं।
  • हटाने के आधार: सिद्ध कदाचार और अक्षमता। हालांकि, इन शब्दों को संविधान में परिभाषित नहीं किया गया है।
  • प्रक्रिया: इसे न्यायाधीश जांच अधिनियम (1968) द्वारा विनियमित किया जाता है।
  • नोट: संविधान में न्यायाधीशों को पद से हटाने के लिए 'महाभियोग' शब्द का उल्लेख नहीं किया गया है।

पद से हटाने की प्रक्रिया के चरण

  • प्रारंभ: प्रस्ताव पर लोक सभा के कम-से-कम 100 सदस्यों या राज्य सभा के 50 सदस्यों के हस्ताक्षर होने चाहिए। 
    • इसे संबंधित सदन के पीठासीन अधिकारी (अध्यक्ष/ सभापति) को सौंपा जाता है, जो इसे स्वीकार या अस्वीकार कर सकता है।
  • जांच: यदि प्रस्ताव स्वीकार कर लिया जाता है, तो आरोपों की जांच के लिए तीन सदस्यीय समिति का गठन किया जाता है। इस तीन सदस्यीय समिति में उच्चतम न्यायालय का एक न्यायाधीश, किसी उच्च न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश और एक प्रतिष्ठित न्यायविद शामिल होता है।
    • प्रस्ताव स्वीकार होने पर लोक सभा अध्यक्ष या राज्य सभा के सभापति द्वारा समिति का गठन किया जाता है।
    • जांच पूरी करने के बाद, समिति अपनी रिपोर्ट अध्यक्ष या सभापति को सौंपती है, जो इसे संसद के संबंधित सदन के पटल पर रखता है।
    • यदि रिपोर्ट में कदाचार या अक्षमता की पुष्टि होती है, तो पद से हटाने के प्रस्ताव पर विचार और चर्चा की जाती है।
  • संसदीय स्वीकृति: प्रस्ताव को संसद के दोनों सदनों में विशेष बहुमत (उस सदन की कुल सदस्यता का बहुमत तथा उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों का दो-तिहाई बहुमत) से पारित होना आवश्यक है।
  • राष्ट्रपति की कार्रवाई: दोनों सदनों से पारित होने के बाद, पद से हटाने के लिए एक संबोधन राष्ट्रपति को प्रस्तुत किया जाता है। इसे उसी सत्र में राष्ट्रपति को प्रस्तुत किया जाना होता है। इसके बाद राष्ट्रपति पद से हटाने का आदेश जारी करता है।
  • उल्लेखनीय है कि अभी तक, उच्चतर न्यायपालिका (उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालय) के किसी भी न्यायाधीश को उपर्युक्त प्रक्रिया द्वारा नहीं हटाया गया है।
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संवैधानिक प्रावधान (Constitutional Provision)

ये भारतीय संविधान में निहित वे नियम और उपबंध हैं जो देश के शासन, नागरिकों के अधिकारों और विभिन्न संस्थाओं की शक्तियों और कार्यों को परिभाषित करते हैं। अनुच्छेद 124 और 218 न्यायाधीशों को हटाने से संबंधित संवैधानिक प्रावधानों के उदाहरण हैं।

उच्चतर न्यायपालिका (Higher Judiciary)

यह शब्द भारत के उच्चतम न्यायालय (Supreme Court) और उच्च न्यायालयों (High Courts) के न्यायाधीशों को संदर्भित करता है। भारतीय संविधान में इनके न्यायाधीशों को पद से हटाने की एक विशिष्ट प्रक्रिया निर्धारित है।

विशेष बहुमत (Special Majority)

संसदीय प्रक्रिया में, यह एक प्रकार का बहुमत है जिसमें किसी सदन की कुल सदस्यता का बहुमत और उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों का दो-तिहाई बहुमत आवश्यक होता है। न्यायाधीशों को हटाने के प्रस्ताव के लिए इसकी आवश्यकता होती है।

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