न्यायालय ने यह टिप्पणी की कि किसी एक सदन (अर्थात लोक सभा या राज्य सभा) में न्यायाधीश के खिलाफ प्रस्ताव का खारिज होना, दूसरे सदन को जांच आगे बढ़ाने और जांच समिति गठित करने के लिए अक्षम नहीं बनाता है।
न्यायाधीशों को पद से हटाने से संबंधित संवैधानिक प्रावधान
- अनुच्छेद 124 और 218: क्रमशः उच्चतम न्यायालय तथा उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों को पद से हटाने से संबंधित हैं।
- हटाने के आधार: सिद्ध कदाचार और अक्षमता। हालांकि, इन शब्दों को संविधान में परिभाषित नहीं किया गया है।
- प्रक्रिया: इसे न्यायाधीश जांच अधिनियम (1968) द्वारा विनियमित किया जाता है।
- नोट: संविधान में न्यायाधीशों को पद से हटाने के लिए 'महाभियोग' शब्द का उल्लेख नहीं किया गया है।
पद से हटाने की प्रक्रिया के चरण
- प्रारंभ: प्रस्ताव पर लोक सभा के कम-से-कम 100 सदस्यों या राज्य सभा के 50 सदस्यों के हस्ताक्षर होने चाहिए।
- इसे संबंधित सदन के पीठासीन अधिकारी (अध्यक्ष/ सभापति) को सौंपा जाता है, जो इसे स्वीकार या अस्वीकार कर सकता है।
- जांच: यदि प्रस्ताव स्वीकार कर लिया जाता है, तो आरोपों की जांच के लिए तीन सदस्यीय समिति का गठन किया जाता है। इस तीन सदस्यीय समिति में उच्चतम न्यायालय का एक न्यायाधीश, किसी उच्च न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश और एक प्रतिष्ठित न्यायविद शामिल होता है।
- प्रस्ताव स्वीकार होने पर लोक सभा अध्यक्ष या राज्य सभा के सभापति द्वारा समिति का गठन किया जाता है।
- जांच पूरी करने के बाद, समिति अपनी रिपोर्ट अध्यक्ष या सभापति को सौंपती है, जो इसे संसद के संबंधित सदन के पटल पर रखता है।
- यदि रिपोर्ट में कदाचार या अक्षमता की पुष्टि होती है, तो पद से हटाने के प्रस्ताव पर विचार और चर्चा की जाती है।
- संसदीय स्वीकृति: प्रस्ताव को संसद के दोनों सदनों में विशेष बहुमत (उस सदन की कुल सदस्यता का बहुमत तथा उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों का दो-तिहाई बहुमत) से पारित होना आवश्यक है।
- राष्ट्रपति की कार्रवाई: दोनों सदनों से पारित होने के बाद, पद से हटाने के लिए एक संबोधन राष्ट्रपति को प्रस्तुत किया जाता है। इसे उसी सत्र में राष्ट्रपति को प्रस्तुत किया जाना होता है। इसके बाद राष्ट्रपति पद से हटाने का आदेश जारी करता है।
- उल्लेखनीय है कि अभी तक, उच्चतर न्यायपालिका (उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालय) के किसी भी न्यायाधीश को उपर्युक्त प्रक्रिया द्वारा नहीं हटाया गया है।