CJI सूर्यकांत के अनुसार माध्यस्थम् (Arbitration) ढांचा काफी परिपक्व हुआ है, लेकिन चुनौतियां बरकरार हैं | Current Affairs | Vision IAS

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In Summary

  • विधायी और न्यायिक सुधारों के बावजूद भारत की मध्यस्थता प्रणाली चुनौतियों का सामना कर रही है, जिससे यह अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता के लिए कम पसंदीदा स्थान बन गया है।
  • यूएनसीआईटीआरएएल मॉडल कानून द्वारा शासित मध्यस्थता और सुलह अधिनियम, 1996 में दक्षता में सुधार और धोखाधड़ी से निपटने के लिए 2015, 2019 और 2021 में संशोधन किए गए हैं।
  • सिफारिशों में कानूनों का आधुनिकीकरण करना, न्यायिक हस्तक्षेप को सीमित करना, प्रौद्योगिकी का लाभ उठाना और मध्यस्थता व्यवस्था को मजबूत करने के लिए जन जागरूकता बढ़ाना शामिल है।

In Summary

विधायी और न्यायिक सुधारों के माध्यम से माध्यस्थम् तंत्र को मजबूत करने के महत्वपूर्ण प्रयास किए जा रहे हैं। इसके बावजूद, भारत अभी भी अंतर्राष्ट्रीय माध्यस्थम् के लिए एक पसंदीदा गंतव्य बनने के मामले में काफी पीछे है।

माध्यस्थम् क्या है?

माध्यस्थम् एक ऐसी प्रक्रिया है, जिसमें पक्षों की सहमति से विवाद को एक या एक से अधिक माध्यस्थमों (arbitrators) के पास भेजा जाता है, जो विवाद पर एक बाध्यकारी निर्णय लेते हैं। यह एक अर्ध-न्यायिक (quasi-judicial) कार्यवाही है। यह वैकल्पिक विवाद समाधान (ADR) के तंत्रों में से एक है।

भारत में माध्यस्थम् तंत्र

  • भारत में माध्यस्थम् की कार्यवाही मुख्य रूप से माध्यस्थम् और सुलह अधिनियम, 1996 (Arbitration and Conciliation Act, 1996) द्वारा शासित होती है।
    • यह संयुक्त राष्ट्र अंतर्राष्ट्रीय व्यापार विधि आयोग (UNCITRAL) के अंतर्राष्ट्रीय वाणिज्यिक माध्यस्थम् पर मॉडल कानून (1985) और UNCITRAL सुलह नियमों (1980) पर आधारित है।
    • इसके तहत दिए गए पंचाट (Awards) अंतिम, बाध्यकारी और विश्व स्तर पर प्रवर्तनीय (enforceable) होते हैं।
    • मुंबई अंतर्राष्ट्रीय माध्यस्थम् केंद्र (MCIA) और दिल्ली अंतर्राष्ट्रीय माध्यस्थम् केंद्र (DIAC) इस क्षेत्र में संस्थागत सहायता प्रदान करते हैं।
    • अधिनियम में किए गए प्रमुख संशोधन: 
      • 2015: कार्यवाही पूरी करने के लिए 12 महीने की समय-सीमा निर्धारित की गई; अदालती हस्तक्षेप को कम किया गया आदि।
      • 2019: भारतीय माध्यस्थम् परिषद (ACI) के गठन का प्रावधान किया गया।
      • 2021: यदि माध्यस्थम् समझौता या पंचाट धोखाधड़ी या भ्रष्टाचार से प्राप्त किया गया हो, तो पंचाट के प्रवर्तन पर बिना शर्त रोक (unconditional stay) लगाने की अनुमति दी गई।

माध्यस्थम् शासन को मजबूत करने के सुझाव

  • कानूनों का आधुनिकीकरण: घरेलू कानूनी ढांचे को अंतर्राष्ट्रीय मानकों के अनुरूप बनाना चाहिए।
  • न्यायिक हस्तक्षेप को सीमित करना: अदालतों द्वारा 'प्रो-आर्बिट्रेशन' (माध्यस्थम्-अनुकूल) रुख अपनाना चाहिए।
  • प्रौद्योगिकी का लाभ उठाना: ई-फाइलिंग और वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग जैसे डिजिटल उपकरणों का उपयोग करना चाहिए।
  • जन जागरूकता बढ़ाना: सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी (ICT) अभियानों के माध्यम से लोगों को जागरूक करना चाहिए।
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प्रो-आर्बिट्रेशन (Pro-Arbitration)

न्यायिक दृष्टिकोण जो मध्यस्थम प्रक्रिया का समर्थन करता है और मध्यस्थता निर्णयों के प्रवर्तन को सुविधाजनक बनाता है, अदालती हस्तक्षेप को कम करता है।

भारतीय माध्यस्थम् परिषद (ACI - Arbitration Council of India)

मध्यस्थम के क्षेत्र में मध्यस्थों की नियुक्ति, प्रशिक्षण और मानकों को विनियमित करने के लिए गठित की जाने वाली एक प्रस्तावित परिषद।

दिल्ली अंतर्राष्ट्रीय माध्यस्थम् केंद्र (DIAC - Delhi International Arbitration Centre)

दिल्ली में स्थित एक संस्था जो मध्यस्थम और सुलह के लिए प्रशासनिक सेवाएं और मंच प्रदान करती है।

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