विधायी और न्यायिक सुधारों के माध्यम से माध्यस्थम् तंत्र को मजबूत करने के महत्वपूर्ण प्रयास किए जा रहे हैं। इसके बावजूद, भारत अभी भी अंतर्राष्ट्रीय माध्यस्थम् के लिए एक पसंदीदा गंतव्य बनने के मामले में काफी पीछे है।
माध्यस्थम् क्या है?
माध्यस्थम् एक ऐसी प्रक्रिया है, जिसमें पक्षों की सहमति से विवाद को एक या एक से अधिक माध्यस्थमों (arbitrators) के पास भेजा जाता है, जो विवाद पर एक बाध्यकारी निर्णय लेते हैं। यह एक अर्ध-न्यायिक (quasi-judicial) कार्यवाही है। यह वैकल्पिक विवाद समाधान (ADR) के तंत्रों में से एक है।

भारत में माध्यस्थम् तंत्र
- भारत में माध्यस्थम् की कार्यवाही मुख्य रूप से माध्यस्थम् और सुलह अधिनियम, 1996 (Arbitration and Conciliation Act, 1996) द्वारा शासित होती है।
- यह संयुक्त राष्ट्र अंतर्राष्ट्रीय व्यापार विधि आयोग (UNCITRAL) के अंतर्राष्ट्रीय वाणिज्यिक माध्यस्थम् पर मॉडल कानून (1985) और UNCITRAL सुलह नियमों (1980) पर आधारित है।
- इसके तहत दिए गए पंचाट (Awards) अंतिम, बाध्यकारी और विश्व स्तर पर प्रवर्तनीय (enforceable) होते हैं।
- मुंबई अंतर्राष्ट्रीय माध्यस्थम् केंद्र (MCIA) और दिल्ली अंतर्राष्ट्रीय माध्यस्थम् केंद्र (DIAC) इस क्षेत्र में संस्थागत सहायता प्रदान करते हैं।
- अधिनियम में किए गए प्रमुख संशोधन:
- 2015: कार्यवाही पूरी करने के लिए 12 महीने की समय-सीमा निर्धारित की गई; अदालती हस्तक्षेप को कम किया गया आदि।
- 2019: भारतीय माध्यस्थम् परिषद (ACI) के गठन का प्रावधान किया गया।
- 2021: यदि माध्यस्थम् समझौता या पंचाट धोखाधड़ी या भ्रष्टाचार से प्राप्त किया गया हो, तो पंचाट के प्रवर्तन पर बिना शर्त रोक (unconditional stay) लगाने की अनुमति दी गई।
माध्यस्थम् शासन को मजबूत करने के सुझाव
- कानूनों का आधुनिकीकरण: घरेलू कानूनी ढांचे को अंतर्राष्ट्रीय मानकों के अनुरूप बनाना चाहिए।
- न्यायिक हस्तक्षेप को सीमित करना: अदालतों द्वारा 'प्रो-आर्बिट्रेशन' (माध्यस्थम्-अनुकूल) रुख अपनाना चाहिए।
- प्रौद्योगिकी का लाभ उठाना: ई-फाइलिंग और वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग जैसे डिजिटल उपकरणों का उपयोग करना चाहिए।
- जन जागरूकता बढ़ाना: सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी (ICT) अभियानों के माध्यम से लोगों को जागरूक करना चाहिए।