रूस के घटते प्रभाव और संयुक्त राज्य अमेरिका की बढ़ती अप्रत्याशितता के दौर में, वैश्विक भू-राजनीति में एक "तीसरे ध्रुव" की अवधारणा ने प्रमुखता प्राप्त कर ली है।
- यह अवधारणा भारत के जर्मनी (और विस्तार द्वारा यूरोप) तथा अन्य मध्यवर्ती शक्तियों के साथ एक रणनीतिक जुड़ाव को संदर्भित करती है।
- यह तीसरा वैश्विक शक्ति केंद्र एक बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था को आकार दे सकता है। यह विश्व व्यवस्था रणनीतिक स्वायत्तता, आर्थिक खुलेपन, तकनीकी सहयोग, लोकतांत्रिक मानदंडों और नियम-आधारित वैश्विक शासन के साझा मूल्यों पर आधारित होगी।
भारत इस तीसरे वैश्विक ध्रुव का लाभ कैसे उठा सकता है:
- रणनीतिक साझेदारी का विविधीकरण: किसी एक शक्ति गुट (अमेरिका या रूस) पर अत्यधिक निर्भरता को कम करना।
- आर्थिक लचीलापन: यूरोपीय संघ (EU) और जर्मनी के साथ गहन सहभागिता के माध्यम से एकतरफा व्यापारिक कार्रवाइयों के जोखिमों को कम करना।
- तीसरा ध्रुव अमेरिका-चीन आधारित आपूर्ति श्रृंखलाओं से हटकर विविधता लाकर और दक्षिण-दक्षिण आर्थिक सहयोग के माध्यम से वैश्विक आर्थिक संरचना को आकार दे सकता है।
- औद्योगिक तंत्र को मजबूत करना: रक्षा, प्रौद्योगिकी और महत्वपूर्ण आपूर्ति श्रृंखलाओं में सह-उत्पादन के माध्यम से।
- वैश्विक शासन में विश्वसनीय अभिव्यक्ति: भारत संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में सुधार, विश्व व्यापार संगठन (WTO) में सुधारों और अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF)/विश्व बैंक के पुनर्गठन आदि के लिए दबाव डाल सकता है।
- ग्लोबल साउथ का नेतृत्व: जलवायु वित्त, ऋण राहत और विकासात्मक न्याय का समर्थन करके।