यह विधेयक सोशल नेटवर्क्स पर और व्यापक प्लेटफॉर्म्स के भीतर मौजूद सोशल नेटवर्किंग फंक्शनैलिटीज पर 15 वर्ष से कम आयु के बच्चों के अकाउंट को प्रतिबंधित करने का प्रस्ताव करता है। इस प्रकार यह कदम नाबालिगों पर सोशल मीडिया के प्रभाव के बारे में बढ़ती चिंताओं को दर्शाता है।
- इससे पहले, यूरोपीय संसद ने भी यूरोपीय संघ (EU) से बच्चों के लिए सोशल मीडिया तक पहुंच की न्यूनतम आयु निर्धारित करने का आह्वान किया था। हालांकि, आयु सीमा लागू करना सदस्य देशों का व्यक्तिगत निर्णय है।
बच्चों पर सोशल मीडिया के प्रभाव
- मानसिक स्वास्थ्य सुभेद्यता: ऑनलाइन आदर्शवादी व्यक्तित्वों के साथ तुलना, 'पीछे छूट जाने का डर' (FOMO) और लाइक-कमेंट के जरिए मान्यता प्राप्त करने की व्यवहारिक आदत के कारण किशोरों में चिंता, अवसाद, बॉडी-इमेज असुरक्षा और कम आत्मसम्मान जैसी समस्याएं देखी जा रही हैं।
- ऑनलाइन कट्टरपंथ: एल्गोरिदम-आधारित प्लेटफॉर्म्स ऐसी बंद विश्वास प्रणालियां बना देते हैं, जो चरम विचारों, स्त्री-द्वेष और पुरुष-केंद्रित (जैसे 'मैनोस्फीयर' समुदाय) का सामान्यीकरण करती हैं।
- सोशल मीडिया की लत: स्क्रीन पर अत्यधिक समय बिताने से वास्तविक जीवन के रिश्तों और सामाजिक कौशल का क्षरण होने का खतरा बढ़ गया है। इससे सामाजिक अलगाव और ऑनलाइन दुष्प्रचार के प्रति संवेदनशीलता बढ़ गई है।
- साइबर बुलिंग: अनामता (Anonymity) और भावनात्मक संकेतों की कमी के कारण ट्रोलिंग, उत्पीड़न एवं शोषण को बढ़ावा मिलता है (जैसे दिल्ली का 'बॉयस लॉकर रूम' मामला)।
आगे की राह
- डिजिटल साक्षरता: इंटरनेट के जिम्मेदार, सुरक्षित और नैतिक उपयोग को बढ़ावा देना चाहिए। इससे किशोरों को सोच-समझकर निर्णय लेने और 'निष्क्रिय उपभोग' की बजाय आलोचनात्मक जुड़ाव की ओर बढ़ने में मदद मिलेगी।
- अभिभावकों की निगरानी: अलगाव, लत और ऑनलाइन सुभेद्यता को रोकने के लिए घर पर खुले संवाद, पर्यवेक्षण एवं भावनात्मक समर्थन को प्रोत्साहित करना चाहिए।
- स्कूली शिक्षा में सुधार: एंटी-बुलिंग तंत्र, परामर्श सहायता, शिक्षक प्रशिक्षण और आयु-उपयुक्त पाठ्यक्रम (जैसे- संबंध स्थापना, यौन और स्वास्थ्य शिक्षा) को मजबूत करना चाहिए।
- जवाबदेही: प्लेटफॉर्म की जवाबदेही तय करनी चाहिए; बच्चों के अनुकूल डिजाइन किए गए और सुरक्षित एल्गोरिदम लागू करने चाहिए, जिसे सुसंगत शिक्षा, किशोर न्याय एवं डेटा सुरक्षा नीतियों का समर्थन प्राप्त हो आदि।