कर्नाटक सरकार 16 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के लिए और आंध्र प्रदेश सरकार 13 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया के उपयोग पर प्रतिबंध लगाने की योजना बना रही है।
- ध्यातव्य है कि आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 में डिजिटल व्यसन (digital addiction) को युवाओं के लिए एक प्रमुख खतरे के रूप में चिन्हित किया गया है।
- इसके साथ ही यह सुझाव दिया गया कि उम्र के आधार पर ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के उपयोग पर सीमाएँ लगाई जाए और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म स्तर पर उपयोगकर्ताओं की उम्र के सत्यापन की व्यवस्था की जाए।
सोशल मीडिया पर आयु-आधारित प्रतिबंधों का महत्व
- बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य की सुरक्षा: डिजिटल व्यसन, साइबर बुलिंग और हानिकारक ऑनलाइन कंटेंट के संपर्क में आने के बारे में चिंताएँ बढ़ रही हैं।
- अत्यधिक स्क्रीन टाइम: स्मार्टफोन और सोशल मीडिया के अनियंत्रित उपयोग से बच्चों के संज्ञानात्मक (cognitive) और सामाजिक विकास पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।
- स्वस्थ जीवनशैली को बढ़ावा देना: पूरक पहलों के माध्यम से स्कूली बच्चों में पढ़ने की आदत डाली जा सकती है और ऑफलाइन गतिविधियों को प्रोत्साहन दिया जा सकता है।
प्रतिबंध को लागू करने में मुख्य चुनौतियां
- अधिकार क्षेत्र को लेकर बाधाएं: सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 के तहत इंटरनेट का विनियमन विशेष रूप से केंद्र सरकार के अधिकार क्षेत्र में आता है। इस तरह सोशल मीडिया पर राज्य सरकारों द्वारा प्रतिबंध लगाने से संवैधानिक और विधिक चुनौतियां उत्पन्न हो सकती हैं।
- प्रवर्तन: आयु-सत्यापन हेतु सटीक उपकरण नहीं होने और सोशल मीडिया प्लेटफार्मों द्वारा नियमों का सख्ती से अनुपालन नहीं किए जाने से उपयोगकर्ताओं की आयु का सत्यापन और निगरानी करना चुनौतीपूर्ण बना हुआ है।
- अधिकारों के उल्लंघन को लेकर चिंताएं और विरोध: आलोचकों का तर्क है कि सोशल मीडिया के उपयोग पर प्रतिबंध ‘बच्चों के सूचना, अभिव्यक्ति और भागीदारी के अधिकारों का उल्लंघन’ करता है। ये आलोचक दंडात्मक कार्रवाइयों की बजाय डिजिटल साक्षरता बढ़ाने का समर्थन करते हैं।
- उद्योग-जगत की चिंताएं: प्रतिबंध के कारण नाबालिग कम विनियमित या असुरक्षित ऑनलाइन प्लेटफॉर्म का उपयोग करना शुरू कर सकते हैं।
बच्चों द्वारा सोशल मीडिया के उपयोग पर प्रतिबंध लगाने वाले अन्य देश
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