मूनशॉट परियोजना का उद्देश्य शरीर के अंदर लगाने योग्य (इम्प्लांटेबल) और नॉन-इनवेसिव (बिना सर्जरी के इस्तेमाल होने वाले) ब्रेन को-प्रोसेसर विकसित करना है।
- ये उपकरण मस्तिष्क से मिलने वाले संकेतों (न्यूरल गतिविधि) को रिकॉर्ड करके उन्हें समझेंगे और संसाधित करेंगे, और फिर न्यूरल स्टिमुलेशन (तंत्रिका उद्दीपन) के माध्यम से इन संकेतों को दोबारा मस्तिष्क में भेजेंगे।
ब्रेन को-प्रोसेसर के बारे में
- ब्रेन को-प्रोसेसर ऐसे AI-आधारित, द्विदिशीय (बिडायरेक्शनल) न्यूरल इंटरफेस होते हैं, जो मस्तिष्क से आने वाले संकेतों को समझते (डिकोड) और उनका विश्लेषण करते हैं, और फिर उन्हें दोबारा मस्तिष्क में भेजते हैं (री-एन्कोड)।
- सामान्य ब्रेन-कंप्यूटर इंटरफेस (BCI) से अलग, ये केवल संकेत पढ़ने तक सीमित नहीं होते। ये मस्तिष्क की पूरी संज्ञानात्मक प्रक्रिया जैसे अनुभूति (Perception), ध्यान (Attention), निर्णयन और शरीर की गतिविधियों का नियंत्रण (मोटर कंट्रोल) को ध्यान में रखकर कार्य करते हैं।
- प्राथमिक लक्ष्य: स्ट्रोक से प्रभावित लोगों में हाथ को आगे बढ़ाने और चीज़ों को पकड़ने की क्षमता को फिर से बहाल करना।
नॉन-इनवेसिव ब्रेन स्टिमुलेशन (NIBS) के बारे में
- यह एक ऐसी तकनीक है जो सर्जिकल प्रत्यारोपण के बिना मस्तिष्क की गतिविधि को नियंत्रित करती है।
- इसमें ट्रांसक्रेनियल मैग्नेटिक स्टिमुलेशन (TMS) और ट्रांसक्रेनियल डायरेक्ट करंट स्टिमुलेशन (tDCS) जैसी पद्धतियों का उपयोग किया जाता है।
- TMS और tDCS में मस्तिष्क के खुले हिस्से पर इलेक्ट्रोड लगाने की आवश्यकता नहीं होती और इनका उपयोग न्यूरोलॉजिकल, मनोचिकित्सीय और न्यूरोडीजेनेरेटिव विकारों पर शोध में किया जाता है।
ब्रेन को-प्रोसेसर से जुड़ी चिंताएं
- नैतिक चिंता: मस्तिष्क से जुड़ा डेटा (न्यूरल डेटा) की गोपनीयता (प्राइवेसी) और व्यक्ति की स्वतंत्रता को लेकर चिंता।
- सुरक्षा जोखिम: लंबे समय तक मस्तिष्क की गतिविधि में बदलाव (न्यूरल मॉड्यूलेशन) या मशीन लगाने के कारण स्वास्थ्य से जुड़े खतरे उत्पन्न हो सकते हैं।
- दुरुपयोग की आशंका: इस तकनीक का गलत उपयोग संज्ञानात्मक क्षमता बढ़ाने (कॉग्निटिव एन्हांसमेंट) या निगरानी (सर्विलांस) के लिए किया जा सकता है।
उपाय:
- उपर्युक्त तकनीक के उपयोग के लिए सख्त नियम-कानून बनाने और नैतिकता आधारित निगरानी की जरूरत है।