8 मार्च को मनाए जा रहे अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस 2026 की थीम है- "अधिकार- न्याय-कार्रवाई (Rights. Justice. Action.)”। यह थीम 'अंतर्राष्ट्रीय महिला कृषक वर्ष (2026)' के अनुरूप है और महिला कृषकों के सशक्तिकरण के महत्व पर प्रकाश डालती है।
- भारत में कुल ‘परिचालित क्षेत्र' (Operated Area) का 11.72% महिला परिचालित-क्षेत्र धारकों (female operational holders) द्वारा संचालित था।
- कृषि में परिचालित क्षेत्र का आशय उस कुल जमीन से है, जो स्वामित्व, पट्टे (लीज) या किराए पर ली गई हो और जिसका उपयोग पूरी तरह या आंशिक रूप से कृषि उत्पादन के लिए किया जाता हो।
कृषि में महिलाओं द्वारा सामना की जाने वाली प्रमुख समस्याएं
- भूमि-स्वामित्व की कमी: विश्व बैंक के अनुसार, कानूनी रूप से विरासत का अधिकार होने के बावजूद महिलाओं के पास केवल 11% कृषि भूमि का स्वामित्व है।
- संस्थागत स्रोतों से वित्तीय सहायता प्राप्त करने में समस्या: भूमि के स्वामित्व का दस्तावेज न होने के कारण महिलाओं को कर्ज, फसल बीमा, सिंचाई योजनाओं, कृषि विस्तार सेवाओं और सरकारी कृषि कार्यक्रमों का लाभ लेने में कठिनाई होती है।
- कृषि का स्त्रीकरण (Feminisation of Agriculture): पुरुषों के शहरों की ओर पलायन के कारण कृषि में महिलाओं की जिम्मेदारियां बढ़ गई हैं, लेकिन संसाधनों, निर्णय लेने की शक्ति और लाभों में समान बढ़ोतरी नहीं हुई है।
महिला सशक्तिकरण के लिए आगे की राह
- महिलाओं को किसान के रूप में मान्यता देना: किसानों को भूमि स्वामित्व की बजाय कृषि कार्य के आधार पर परिभाषित किया जाए। साथ ही, महिला और पुरुष कृषकों पर अलग-अलग लैंगिक-वार डेटा एकत्र किए जाएँ।
- भूमि और संसाधन अधिकारों को मजबूत करना: समानता आधारित विरासत कानून, संयुक्त भूमि स्वामित्व, महिलाओं के नाम पर संपत्ति के लिए प्रोत्साहन और महिला-संवेदनशील भूमि प्रशासन को बढ़ावा दिया जाए।
- प्रौद्योगिकियों और सेवाओं तक पहुँच में सुधार: महिलाओं को श्रम बचाने वाले उपकरण, समावेशी कृषि सलाह सेवाएँ, बाजार की जानकारी और जलवायु-अनुकूल खेती का ज्ञान उपलब्ध कराया जाए।
