उच्चतम न्यायालय ने वर्सोवा-भायंदर कोस्टल रोड परियोजना के लिए मैंग्रोव हटाने के बॉम्बे उच्च न्यायालय के निर्णय को बरकरार रखा। भारत के मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि जहां पर्यावरण संरक्षण के नियमों को सख्ती से लागू किया जाना चाहिए, वहीं इनका विकास के साथ संतुलन भी आवश्यक है।
मैंग्रोव के बारे में
- परिभाषा: मैंग्रोव लवण-सहिष्णु पादपों के समूह हैं। ये उष्णकटिबंधीय और उपोष्णकटिबंधीय ज्वारीय क्षेत्रों में उगते हैं, जहां भूमि और समुद्र मिलते हैं।
- प्रकार: चार मुख्य प्रकार हैं—रेड, ब्लैक, व्हाइट और बटनवुड।
- भारत में प्राप्ति वाले क्षेत्र: भारत में मैंग्रोव वन लगभग 4,991.68 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैले हैं। ये वन 9 राज्यों और 4 संघ राज्य क्षेत्रों में प्राप्त होते हैं।
- पश्चिम बंगाल की हिस्सेदारी सबसे अधिक 42.45% है, इसके बाद गुजरात तथा अंडमान और निकोबार द्वीप समूह का स्थान है।
- मुख्य खतरे:
- अवसंरचना निर्माण और विकास के लिए मैंग्रोव वनों की अनियंत्रित कटाई हो रही है।
- जलवायु परिवर्तन और बढ़ते CO2 स्तर "हाइपरकैपनिक हाइपोक्सिया" (hypercapnic hypoxia) का कारण बन रहे हैं। हाइपरकैपनिक हाइपोक्सिया से मैंग्रोव वन वाले जल में ऑक्सीजन की कमी हो जाती है और मछलियों के प्रजनन स्थलों पर खतरा बढ़ता है
- अवसंरचना निर्माण और विकास के लिए मैंग्रोव वनों की अनियंत्रित कटाई हो रही है।
आगे की राह
- मैंग्रोव पारिस्थितिकी तंत्र की रक्षा के लिए संधारणीय विकास और संरक्षण के बीच एक नाजुक संतुलन बनाने की आवश्यकता है।
- तटीय विनियमन क्षेत्र (CRZ) कानूनों का सख्ती से पालन होना चाहिए और प्रतिपूरक वनीकरण (Compensatory Afforestation) का भी अनिवार्य रूप से अनुपालन होना चाहिए।
- ‘मैंग्रोव इनिशिएटिव फॉर शोरलाइन हैबिटेट्स एंड टैगेबल इनकम्स (मिष्टी/MISHTI)’ जैसे सामुदायिक आधारित मैंग्रोव पुनर्बहाली कार्यक्रमों को बढ़ावा देना चाहिए।
