एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन को संबोधित करते हुए, केंद्रीय मंत्री ने कहा कि भारत की जैव-अर्थव्यवस्था यानी बायोइकोनॉमी वर्ष 2047 तक 1 ट्रिलियन डॉलर तक पहुँचने का अनुमान है, और यह क्षेत्रक आर्थिक संवृद्धि का प्रमुख इंजन बन रहा है।
- जैव-अर्थव्यवस्था: इसका अर्थ जैविक संसाधनों का उत्पादन, उपयोग और संरक्षण, तथा उनसे संबंधित ज्ञान, विज्ञान, तकनीक और नवाचार का उपयोग करना है। इसका उद्देश्य सभी आर्थिक क्षेत्रकों के लिए उत्पाद, प्रक्रियाएं और सेवाएं प्रदान करना है, ताकि एक संधारणीय अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ा जा सके।
भारत की जैव-अर्थव्यवस्था की उपलब्धियां
- क्षेत्रक विकास: इस क्षेत्रक का आकार 2014 के 10 बिलियन डॉलर से बढ़कर 2025 में 195.3 बिलियन डॉलर हो गया। यह सकल घरेलू उत्पाद में 4.8% का योगदान देती है।
- स्टार्ट-अप में वृद्धि: जैव-अर्थव्यवस्था में स्टार्ट-अप्स की संख्या 2014 की 50 से बढ़कर 2025 में 11,855 हो गई।
- चालू खाता घाटे (CAD) में कमी लाने में योगदान: जैव-अर्थव्यवस्था को बढ़ावा मिलने से पेट्रोल आयात में कमी आई है। इससे विदेशी मुद्रा में 12-14 बिलियन डॉलर की बचत हुई।
- जैव-अर्थव्यवस्था के विकास के कारक:
- पेट्रोल में 20% इथेनॉल मिश्रण,
- GLP-1 वर्ग की दवाओं की खपत,
- ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर्स (GCCs) की स्थापना,
- टेक्सटाइल, डिटर्जेंट, खाद्य-प्रसंस्करण, जैव-ईंधन आदि में एंजाइम और माइक्रोब्स का उपयोग।
- अनुसंधान और नवाचार:
- विश्व की पहली DNA कोविड-19 वैक्सीन ZyCoV-D का विकास,
- स्वदेशी CAR-T सेल थेरेपी का विकास,
- mRNA वैक्सीन प्लेटफॉर्म का विकास,
- भारत की पहली स्वदेशी एंटीबायोटिक दवा नैफिथ्रोमाइसिन का विकास,
- राष्ट्रीय बायोबैंक की स्थापना।
भारत में जैव-अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने वाली प्रमुख पहलें
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