उच्चतम न्यायालय ने 15 साल की नाबालिग लड़की को उसके 28 सप्ताह से अधिक के गर्भ को चिकित्सीय रूप से समाप्त करने की अनुमति दी | Current Affairs | Vision IAS

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In Summary

  • सर्वोच्च न्यायालय ने प्रजनन संबंधी विकल्प को अनुच्छेद 21 के तहत संवैधानिक गारंटी के रूप में पुष्टि की, जो व्यक्तिगत स्वतंत्रता और निजता का अभिन्न अंग है।
  • एमटीपी अधिनियम 1971 (संशोधित 2021) नाबालिगों के लिए 24 सप्ताह तक और भ्रूण में गंभीर असामान्यताओं के मामले में 24 सप्ताह से अधिक समय तक गर्भपात की अनुमति देता है।
  • इन मुद्दों में शारीरिक स्वायत्तता और भ्रूण के अधिकारों के बीच संतुलन बनाना, सुरक्षित पहुंच सुनिश्चित करना और महिलाओं की निर्णय लेने की शक्ति को सीमित करने वाले पितृसत्तात्मक नियंत्रण को संबोधित करना शामिल है (एनएफएचएस-5: 10% महिलाएं स्वास्थ्य संबंधी मामलों में स्वतंत्र रूप से निर्णय लेती हैं)।

In Summary

उच्चतम न्यायालय ने इस बात पर जोर दिया कि कोई भी न्यायिक संस्था किसी महिला—विशेष रूप से एक नाबालिग—को उसकी स्पष्ट इच्छा के विरुद्ध अनचाहे गर्भ को धारण करने के लिए मजबूर नहीं कर सकती है।  

  • उच्चतम न्यायालय के इस निर्णय ने प्रजनन विकल्प (reproductive choice) को एक मूल संवैधानिक गारंटी के रूप में व्यक्त किया।
  • न्यायालय ने माना कि अपने शरीर से संबंधित निर्णय लेने का अधिकार, विशेषकर प्रजनन के मामलों में, संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत "दैहिक स्वतंत्रता और निजता का अधिकार" (Personal liberty and privacy) का अभिन्न हिस्सा है।
  • कानूनी रूप से, गर्भ का चिकित्सकीय समापन (MTP) अधिनियम 1971 (2021 में संशोधित) निम्नलिखित शर्तों के साथ गर्भपात की अनुमति देता है:
    • 20 सप्ताह तक के गर्भ के मामले में एक चिकित्सक की राय पर, या 
    • नाबालिगों जैसी विशेष श्रेणियों को 24 सप्ताह तक के गर्भ के मामले में दो चिकित्सकों की राय पर।
    • 24 सप्ताह से अधिक के गर्भ के मामले में केवल गंभीर भ्रूण विकारों के स्थिति में, मेडिकल बोर्ड द्वारा पुष्टि होने पर ही गर्भपात की अनुमति दी जा सकती है।

प्रजनन स्वायत्तता (Reproductive Autonomy) से जुड़े मुख्य मुद्दे

  • विधि और नैतिकता के बीच संतुलन: यह निर्णय दर्शाता है कि एक ओर 'महिला का अपने शरीर पर अधिकार (बॉडिली ऑटोनॉमी)' और दूसरी ओर 'राज्य यानी सरकार का भ्रूण (अजन्मे बच्चे) के जीवन की रक्षा करने का हित' के बीच संतुलन बनाना एक चुनौतीपूर्ण मुद्दा है।
  • सुरक्षा और पहुंच: यदि सुरक्षित और कानूनी गर्भपात की सुविधा नहीं दी जाती है, तो संकट की स्थिति का सामना कर रही महिलाओं को मजबूरी में असुरक्षित और गैर-कानूनी तरीकों का सहारा लेना पड़ सकता है, जिससे उनके शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है।
  • पितृसत्तात्मक नियंत्रण: महिलाओं को एक स्वतंत्र व्यक्ति के रूप में देखने के बजाय केवल बच्चे पैदा करने के साधन के रूप में देखा जाता है, जिससे उनके अपने शरीर और प्रजनन से जुड़े निर्णयों पर उनका अधिकार सीमित हो जाता है।
  • निर्णय लेने की शक्ति का अभाव: राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS)-5 के अनुसार, भारत में केवल लगभग 10% महिलाएं ही अपने स्वास्थ्य से जुड़े निर्णय स्वयं से ले पाती हैं, जो उनकी सीमित स्वायत्तता और सामाजिक बाधाओं को दर्शाता है। 
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राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS)-5

यह भारत में राष्ट्रीय और राज्य स्तर पर परिवार, स्वास्थ्य और पोषण से संबंधित महत्वपूर्ण डेटा एकत्र करने वाला एक बड़े पैमाने पर, बहु-दौर का सर्वेक्षण है।

बॉडिली ऑटोनॉमी (Bodily Autonomy)

यह किसी व्यक्ति का अपने स्वयं के शरीर के बारे में निर्णय लेने का अधिकार है, जिसमें चिकित्सा उपचार, यौन संबंध और प्रजनन संबंधी निर्णय शामिल हैं।

प्रजनन स्वायत्तता (Reproductive Autonomy)

यह व्यक्ति का अपने प्रजनन और परिवार नियोजन संबंधी निर्णयों को स्वतंत्र रूप से लेने का अधिकार है, जिसमें बच्चे पैदा करने, न करने या कब और कितने बच्चे पैदा करने का निर्णय शामिल है। न्यायालय ने इसे जन्म देने के जैविक कार्य तक सीमित नहीं माना है।

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