'नेचर इकोलॉजी एंड इवोल्यूशन' पत्रिका में प्रकाशित यह अध्ययन पारिस्थितिकी तंत्र की रक्षा के लिए जैव विविधता संरक्षण के साथ जलवायु शमन को तत्काल एकीकृत करने की आवश्यकता पर बल देता है।
अध्ययन के मुख्य बिंदुओं पर एक नजर
- संयुक्त खतरे: वर्ष 2085 तक 36% स्थलीय कशेरुकी (vertebrates) जीवों के पर्यावास कई चरम जलवायु घटनाओं (लू, वनाग्नि, सूखा, बाढ़) के प्रभाव में होंगे।
- लू (Heatwaves) प्राथमिक खतरे के रूप में: अनुमान है कि 2085 तक लू 93% प्रजातियों के भौगोलिक क्षेत्रों को प्रभावित करेगी। इसके बाद सर्वाधिक खतरा वनाग्नि से है।
- वर्गिकी के आधार पर खतरे (Taxonomic Vulnerability): उभयचर प्रजातियां सबसे अधिक प्रभावित होंगी, विशेषकर सूखे से।
- इसके अलावा, देशज (नेटिव) प्रजातियों और सीमित भौगोलिक सीमा वाले जीवों पर विलुप्ति का अधिक खतरा है क्योंकि उनके पास सुरक्षित क्षेत्रों में जाने के विकल्प सीमित होते हैं।
- भौगोलिक हॉटस्पॉट: अमेज़न बेसिन, अफ्रीका और दक्षिण-पूर्व एशिया जैसे प्रजाति-समृद्ध क्षेत्र इन संयुक्त खतरों के सबसे अधिक प्रभाव में हैं।
स्थलीय जैव विविधता के संरक्षण के लिए वैश्विक पहलें
- UNFCCC और पेरिस जलवायु परिवर्तन समझौता: इनका लक्ष्य वैश्विक तापवृद्धि को सीमित करना और जलवायु परिवर्तन की वजह से जैव विविधता के समक्ष जोखिमों को कम करना है।
- IPCC की सिफारिशें: इसकी छठी मूल्यांकन रिपोर्ट में लचीलेपन (रेजिलिएंस) विकसित करने के लिए 30-50% पारिस्थितिकी तंत्र की रक्षा करने पर जोर दिया गया है।
- IUCN रेड लिस्ट और FAO की 'वन प्लैनेट, वन हेल्थ' पहल: ये पहलें जलवायु परिवर्तन की वजह से विलुप्ति का सामना कर रही जोखिम वाली प्रजातियों के संरक्षण के लिए मार्गदर्शन प्रदान करती हैं।
- कुनमिंग-मॉन्ट्रियल वैश्विक जैव विविधता फ्रेमवर्क (2022): जैव विविधता अभिसमय के तहत, इस फ्रेमवर्क का लक्ष्य वर्ष 2030 तक 30% भूमि और महासागरों की रक्षा करना है (30x30 लक्ष्य)।
- संयुक्त राष्ट्र पारिस्थितिकी तंत्र पुनर्बहाली दशक (2021-2030): इसका उद्देश्य जीवों के निम्नीकृत पर्यावासों की पुनर्स्थापना को बढ़ावा देना है, जिससे प्रजातियों की सहनशीलता और अनुकूलन क्षमता बढ़ाई जा सके।