किसान उत्पादक संगठन (FPO) कृषि उत्पादकों (जैसे किसान, दूध उत्पादक आदि) के एक समूह द्वारा गठित एक विधिक इकाई है। इस संगठन में उत्पादक ही इसके शेयरधारक होते हैं।
- यह एक उत्पादक कंपनी, सहकारी समिति या कोई अन्य कानूनी रूप वाला संगठन हो सकता है, जिसमें लाभ और नुकसान सदस्य आपस में साझा करते हैं।
- यह या तो कंपनी अधिनियम, 2013 के तहत या संबंधित राज्यों के सहकारी समिति अधिनियम के तहत पंजीकृत होता है।
नीति पत्र में रेखांकित चुनौतियां:
- सीमित संचालन: सदस्यों की कम संख्या के कारण इक्विटी और कार्यशील पूंजी सीमित रहती है, जिससे खरीद और विपणन की क्षमता भी कम हो जाती है।
- अवसंरचना की कमी: कोल्ड स्टोरेज, परिवहन, प्रसंस्करण और मूलभूत सुविधाओं की कमी के कारण मूल्य संवर्धन (वैल्यू एडिशन) और निर्यात की क्षमता सीमित हो जाती है।
- गवर्नेंस संबंधी मुद्दे: इनमें कमजोर नेतृत्व, पारदर्शिता की कमी और खराब प्रबंधन प्रथाएं शामिल हैं।
- अन्य चुनौतियां: किसान उत्पादक संगठनों (FPOs) में सदस्यों की विविधता कम होना (सभी वर्गों का प्रतिनिधित्व नहीं होना), बाजार तक पहुँच की कमी, तकनीकी सहायता का बंद हो जाना, आदि समस्याएं भी शामिल हैं।
मुख्य सिफारिशें
- नियमों के अनुपालन को सरल बनाना: उदाहरण के लिए, FPO संचालन को आसान बनाने के लिए सिंगल विंडो सिस्टम बनाना चाहिए।
- वित्तीय जागरूकता बढ़ाना: वित्तीय संस्थानों और किसान उत्पादक संगठनों (FPOs) के बीच जागरूकता बढ़ाकर उनके सामने आने वाली ऋण और वित्तीय समस्याओं को दूर किया जा सकता है।
- नई प्रौद्योगिकियों को अपनाना: उत्पाद की ट्रेसेब्लिटी के लिए ब्लॉकचेन; वास्तविक समय में निगरानी और पूर्वानुमान के विश्लेषण के लिए कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) और इंटरनेट ऑफ थिंग्स (IoT); तथा पारदर्शी संचालन के लिए वित्तीय सॉफ्टवेयर को अपनाना चाहिए।
- संस्थाओं द्वारा खरीद: रेलवे, सेना और भारतीय खाद्य निगम (FCI) जैसे संस्थागत खरीदारों को अपनी खरीद प्रक्रियाओं में FPOs को प्राथमिकता देना अनिवार्य करना चाहिए।
- अन्य उपाय: इनमें शामिल हैं; अनुसंधान एवं विकास (R&D) से जुड़े संबंधों को मजबूत करना, समुदाय स्तर पर प्रशिक्षण देना, स्थानीय स्तर पर कोल्ड चेन अवसंरचना विकसित करना, समूह आधारित बीमा को बढ़ावा देना, और किसान उत्पादक संगठनों (FPOs) को उद्योगों से जोड़ना आदि।
भारत में FPOs के लिए शुरू की गई पहलें
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