अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था में निजी क्षेत्र की भागीदारी की स्थिति
- स्टार्टअप्स की संख्या में तीव्र वृद्धि: अंतरिक्ष क्षेत्रक में स्टार्टअप्स की संख्या 2019 में एकल अंकों में थीं, जो बढ़कर 2026 की शुरुआत तक 400 से अधिक हो गई। यह निजी क्षेत्र की सुदृढ़ भागीदारी का संकेत है।
- विविध क्षेत्रकों में भागीदारी: स्टार्टअप्स अंतरिक्ष क्षेत्रक की पूरी मूल्य श्रृंखला में सक्रिय हैं। इनमें प्रक्षेपण यान, सैटेलाइट एवं पेलोड विनिर्माण, जमीनी अवसंरचना विकास आदि शामिल हैं।
- निजी क्षेत्र द्वारा पहला रॉकेट प्रक्षेपण: वर्ष 2022 में विक्रम-S निजी क्षेत्र द्वारा निर्मित भारत का पहला रॉकेट बना। इसे "मिशन प्रारंभ" के तहत प्रक्षेपित किया गया।
अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था में निजी क्षेत्र की भागीदारी का महत्व/आवश्यकता
- उच्च संवृद्धि क्षमता: भारत की अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था वर्ष 2033 तक लगभग 44 अरब डॉलर तक पहुँचने का अनुमान है (विश्व में लगभग 8% हिस्सेदारी)। वर्ष 2040 तक यह बढ़कर 100 अरब डॉलर हो सकती है (विश्व में लगभग 10% हिस्सेदारी)।
- अवसंरचना विकास: इसमें निजी क्षेत्र के नेतृत्व वाले पृथ्वी अवलोकन उपग्रह समूह (PPP मॉडल पर आधारित), साझा सैटेलाइट बस प्लेटफॉर्म विकास, आदि शामिल हैं।
- वैश्विक प्रतिस्पर्धा: स्पेसएक्स और ब्लू ओरिजिन जैसी बड़ी कंपनियों के साथ प्रतिस्पर्धा करने के लिए भारत के निजी क्षेत्र को नीतिगत समर्थन और समान अवसर प्रदान करने की आवश्यकता है।
- विस्तारित पहुंच और बेहतर सेवाएं: निजी क्षेत्र की कंपनियां किफायती सैटेलाइट इंटरनेट, रिमोट सेंसिंग और नेविगेशन सेवाओं को वंचित क्षेत्रों तक पहुंचा सकती है।
अंतरिक्ष क्षेत्रक में निजी क्षेत्र की भागीदारी को बढ़ावा देने हेतु प्रमुख पहलें
|