हाल ही में, आम आदमी पार्टी के दो-तिहाई राज्यसभा-सांसदों ने पार्टी छोड़ दी और भाजपा में शामिल हो गए। इसके कारण पार्टी ने सभापति के समक्ष इन सदस्यों को अयोग्य ठहराने हेतु याचिका दायर की। हालांकि, राज्यसभा-सभापति ने इन सात सांसदों के भाजपा में विलय को मंजूरी दे दी।
- संविधान की दसवीं अनुसूची के अनुसार दलबदल के आधार पर अयोग्यता राजनीतिक दल के विलय के मामले में लागू नहीं होती है।
- यह प्रावधान करता है कि संसद के किसी सदन के किसी सदस्य को तब अयोग्य नहीं ठहराया जाएगा जब उसका मूल राजनीतिक दल के कम से कम 2/3 सदस्यों के साथ किसी अन्य राजनीतिक दल में विलय हो जाता है।
- अयोग्यता याचिका में तर्क दिया गया है कि दसवीं अनुसूची के लिए मूल राजनीतिक दल का वास्तविक विलय आवश्यक है, न कि केवल सदन के सदस्यों का पाला बदलना।
दसवीं अनुसूची और सांसदों/विधायकों की अयोग्यता
- इसे लोकप्रिय रूप से दलबदल विरोधी कानून (Anti-Defection Law) कहा जाता है।
- इसे 52वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1985 के माध्यम से संविधान में जोड़ा गया था।
- 91वें संविधान संशोधन अधिनियम ने दल-बदल विरोधी कानून को मजबूत किया। इसने अयोग्यता से बचने के लिए किसी सदन में पार्टी के 1/3 सदस्यों की जगह 2/3 सदस्यों का विलय अनिवार्य कर दिया।
- उद्देश्य: राजनीतिक दलबदल की समस्या से निपटना और लोकतंत्र की रक्षा करना।
- सदस्यों की अयोग्यता के आधार:
- स्वेच्छा से राजनीतिक दल की सदस्यता छोड़ना;
- मतदान के दौरान पार्टी व्हिप का उल्लंघन करना;
- यदि निर्दलीय निर्वाचित सांसद या विधायक किसी राजनीतिक दल में शामिल हो जाता है;
- यदि कोई मनोनीत (नॉमिनेटेड) सदस्य सदन का सदस्य बनने के छह महीने बाद किसी राजनीतिक दल में शामिल होता है।
- निर्भीक और शीघ्र निर्णयों के लिए सांसदों के मामले में न्याय-निर्णयन का कार्य लोकसभा अध्यक्ष/राज्यसभा सभापति को सौंपा गया है, ताकि न्यायिक विलंब से बचा जा सके।