भारत में 10 लाख से अधिक आबादी वाले (मिलियन-प्लस) 47 शहरों में भारत की एक-तिहाई शहरी आबादी रहती है। ये शहर भारत की GDP में 60% का योगदान देते हैं।
- हालांकि, इन शहरों को अवसंरचना की कमी; सेवाओं की आपूर्ति में समस्या; आवास की कमी; परिवहन (मोबिलिटी), पर्यावरणीय संधारणीयता और सामाजिक समावेशन से जुड़ी गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। ये चुनौतियां इन विकसित हो रहे शहरों की रहने योग्य स्थिति (livability) और जीवन की गुणवत्ता को प्रभावित करती हैं।
मिलियन-प्लस शहरों में शहरी शासन की चुनौतियां
- कार्यों या शक्तियों का सीमित हस्तांतरण: 74वें संविधान संशोधन अधिनियम के अनुसार नगर निकायों को 18 कार्यों को सौंपा जाना था, लेकिन इनमें से केवल 4 कार्यों को ही पूर्ण रूप से सौंपा गया है।
- विभाजित संस्थागत ढांचा और अप्रभावी नेतृत्व: निर्वाचित प्रतिनिधियों और नगर निगम प्रशासन के बीच भूमिकाओं का स्पष्ट सीमांकन नहीं हो पाया है।
- महापौरों (Mayors) को नगर शासन का वास्तविक प्रमुख नहीं माना जाता है।
- कम राजस्व और धन का सीमित हस्तांतरण:
- नगर निकायों के स्वयं के राजस्व स्रोत कम है,
- ये आबद्ध अनुदानों (Tied grants) पर अधिक निर्भर हैं;
- राज्य वित्त आयोग के गठन में देरी होती है और उसकी सिफारिशों का आंशिक तौर पर ही क्रियान्वयन हो पाता है।
- लोक सेवा-प्रदायगी में कमियां: सार्वजनिक परिवहन, शहरी योजना-निर्माण, जल और स्वच्छता जैसी प्रमुख सेवाओं में नगर सरकारों की भूमिका बहुत कम या न के बराबर बनी हुई है।
- क्षमता की कमी: कर्मचारियों का समय पर भर्ती नहीं होना, प्रतिनियुक्ति पर उच्च निर्भरता, अधिकारियों का बार-बार स्थानांतरण और प्रशिक्षण में सीमित निवेश अन्य समस्याएं हैं।
रिपोर्ट में की गईं प्रमुख सिफारिशें
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