हाल ही में संपन्न तमिलनाडु विधानसभा चुनावों में, किसी भी एक दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला। त्रिशंकु विधानसभा (Hung assembly) की स्थिति में सरकार गठन में राज्यपाल की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो गई।
राज्य सरकार के गठन में राज्यपाल की भूमिका और संवैधानिक प्रावधान:
- अनुच्छेद 164(1): इसके अनुसार, किसी राज्य के मुख्यमंत्री (CM) की नियुक्ति राज्यपाल द्वारा की जाएगी, जबकि अन्य मंत्रियों की नियुक्ति मुख्यमंत्री की सलाह पर राज्यपाल द्वारा की जाएगी।
- नोट: त्रिशंकु विधानसभा की स्थिति में मुख्यमंत्री चुनने के लिए संविधान में किसी मानदंड का उल्लेख नहीं है।
- विवेकाधीन शक्ति (अनुच्छेद 163): इसके अनुसार, राज्यपाल मुख्यमंत्री के नेतृत्व वाली मंत्रिपरिषद की सहायता और सलाह के अनुसार करेगा, सिवाय उन कुछ कृत्यों को छोड़कर जहां वे अपने विवेक का उपयोग करते हैं।
- जब किसी भी राजनीतिक दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलता है, तब राज्यपाल 'परिस्थितिजन्य विवेक' (situational discretion) का प्रयोग करता है।
सरकारिया आयोग (1987) की सिफारिशें:
- जब किसी एक राजनीतिक दल को विधानसभा में स्पष्ट बहुमत मिलता है, तो राज्यपाल उस दल के नेता को सरकार गठन के लिए आमंत्रित करेगा।
- हालांकि, किसी भी राजनीतिक दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलने (त्रिशंकु विधानसभा) की स्थिति में, आयोग ने मुख्यमंत्री का चयन करने के लिए निम्नलिखित वरीयता क्रम सुझाया था:
- चुनाव-पूर्व गठबंधन को सरकार गठन के लिए आमंत्रित करना,
- बाहरी समर्थन प्राप्त सबसे बड़े राजनीतिक दल को आमंत्रित करना,
- चुनाव-पश्चात बने गठबंधन को आमंत्रित करना
- बाहरी समर्थन के साथ चुनाव-पश्चात बने गठबंधन को आमंत्रित करना।
- संभावित चिंताएँ: कुछ अवसरों पर (जैसे 2017 में गोवा और मणिपुर में), राज्यपालों ने उपर्युक्त वरीयता क्रम का अनुपालन किए बिना ही मुख्यमंत्रियों की नियुक्ति कर दी।
राज्यपाल की विवेकाधीन शक्तियों पर उच्चतम न्यायालय के निर्णय:
सुझाव:
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