राज्यों में सरकार गठन में राज्यपाल की भूमिका | Current Affairs | Vision IAS

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In Summary

  • अनुच्छेद 164(1) राज्यपाल को मुख्यमंत्री की सलाह पर मुख्यमंत्री और अन्य मंत्रियों को नियुक्त करने का अधिकार देता है, जिसमें त्रिशंकु विधानसभाओं के लिए कोई संवैधानिक मानदंड नहीं है।
  • सरकारिया आयोग ने त्रिशंकु विधानसभाओं में मुख्यमंत्री के चयन के लिए चुनाव पूर्व गठबंधन, सबसे बड़ी एकल पार्टी, चुनाव पश्चात गठबंधन और बाहरी समर्थन को प्राथमिकता देने का सुझाव दिया है।
  • एसआर बोम्मई और रामेश्वर प्रसाद के मामलों में सुप्रीम कोर्ट ने सदन में बहुमत की जांच करने और बहुमत दल के नेता को आमंत्रित करने का आदेश दिया है।

In Summary

हाल ही में संपन्न तमिलनाडु विधानसभा चुनावों में, किसी भी एक दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला। त्रिशंकु विधानसभा (Hung assembly) की स्थिति में सरकार गठन में राज्यपाल की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो गई।

राज्य सरकार के गठन में राज्यपाल की भूमिका और संवैधानिक प्रावधान:

  • अनुच्छेद 164(1): इसके अनुसार, किसी राज्य के मुख्यमंत्री (CM) की नियुक्ति राज्यपाल द्वारा की जाएगी, जबकि अन्य मंत्रियों की नियुक्ति मुख्यमंत्री की सलाह पर राज्यपाल द्वारा की जाएगी।
    • नोट: त्रिशंकु विधानसभा की स्थिति में मुख्यमंत्री चुनने के लिए संविधान में किसी मानदंड का उल्लेख नहीं है।
  • विवेकाधीन शक्ति (अनुच्छेद 163): इसके अनुसार, राज्यपाल मुख्यमंत्री के नेतृत्व वाली मंत्रिपरिषद की सहायता और सलाह के अनुसार करेगा, सिवाय उन कुछ कृत्यों को छोड़कर जहां वे अपने विवेक का उपयोग करते हैं।
    • जब किसी भी राजनीतिक दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलता है, तब राज्यपाल 'परिस्थितिजन्य विवेक' (situational discretion) का प्रयोग करता है।

सरकारिया आयोग (1987) की सिफारिशें:

  • जब किसी एक राजनीतिक दल को विधानसभा में स्पष्ट बहुमत मिलता है, तो राज्यपाल उस दल के नेता को सरकार गठन के लिए आमंत्रित करेगा। 
  • हालांकि, किसी भी राजनीतिक दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलने (त्रिशंकु विधानसभा) की स्थिति में, आयोग ने मुख्यमंत्री का चयन करने के लिए निम्नलिखित वरीयता क्रम सुझाया था:
    • चुनाव-पूर्व गठबंधन को सरकार गठन के लिए आमंत्रित करना, 
    • बाहरी समर्थन प्राप्त सबसे बड़े राजनीतिक दल को आमंत्रित करना,
    • चुनाव-पश्चात बने गठबंधन को आमंत्रित करना
    • बाहरी समर्थन के साथ चुनाव-पश्चात बने गठबंधन को आमंत्रित करना। 
  • संभावित चिंताएँ: कुछ अवसरों पर (जैसे 2017 में गोवा और मणिपुर में), राज्यपालों ने उपर्युक्त वरीयता क्रम का अनुपालन किए बिना ही मुख्यमंत्रियों की नियुक्ति कर दी। 

राज्यपाल की विवेकाधीन शक्तियों पर उच्चतम न्यायालय के निर्णय:

  • एस. आर. बोम्मई बनाम भारत संघ वाद (1994): राज्यपाल को सदन में बहुमत रखने वाले दल के नेता या सबसे बड़े दल/गठबंधन के नेता को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित करना चाहिए।
  • रामेश्वर प्रसाद वाद (2006): न्यायालय ने व्यवस्था दी कि किसी सरकार के बहुमत के परीक्षण का संवैधानिक रूप से निर्धारित मंच “सदन का पटल (फ्लोर ऑफ द हाउस)” है।

सुझाव:

  • पुंछी आयोग (2010): त्रिशंकु विधानसभा की स्थिति में राज्यपाल की विवेकाधीन शक्तियों के उपयोग के लिए स्पष्ट दिशा-निर्देश बनाने की सिफारिश की, ताकि मनमाने निर्णयों पर रोक लगाई जा सके।
  • जस्टिस कुरियन जोसेफ समिति: राज्यपाल की विवेकाधीन शक्तियों के उपयोग से जुड़े नियमों को संहिताबद्ध करने के लिए संविधान में एक नई अनुसूची जोड़ने का सुझाव दिया।
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पुंछी आयोग (Poonchi Commission)

2007 में केंद्र-राज्य संबंधों के कामकाज की समीक्षा के लिए गठित आयोग, जिसने राष्ट्रीय एकीकरण, संघीय व्यवस्था की गतिशीलता और विभिन्न नीतिगत क्षेत्रों में सुधारों पर ध्यान केंद्रित किया।

सदन का पटल (फ्लोर ऑफ द हाउस) (Floor of the house)

The legislative assembly where elected members debate and vote on bills and other matters. The Supreme Court has held that the floor of the house is the constitutionally mandated forum to test a government's majority.

एस. आर. बोम्मई बनाम भारत संघ वाद (S.R. Bommai v. Union of India)

A landmark Supreme Court judgment in 1994 that significantly defined and limited the President's/Governor's power to dismiss state governments under Article 356, emphasizing that the floor of the house is the ultimate test of majority.

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