भारत विदेशी मानव रहित हवाई वाहनों (UAVs) का खरीदार होने से आगे बढ़कर स्वदेशी और आत्मनिर्भर (संप्रभु) तकनीकों का विकासकर्ता बनकर एक बड़ा परिवर्तन कर रहा है।
- हाल ही में थल सेना, नौसेना और वायुसेना के लिए 87 मीडियम एटीट्यूड लॉन्ग एंड्योरेंस (MALE) ड्रोन खरीदने हेतु ₹32,350 करोड़ के कार्यक्रम को मंजूरी दी गई।
UAV में संप्रभु या आत्मनिर्भर क्षमता निर्माण की आवश्यकता क्यों है?
- मुख्य अवसंरचना का हिस्सा: ड्रोन अब केवल सहायक सैन्य उपकरण नहीं रहे, बल्कि मुख्य सामरिक अवसंरचना का हिस्सा बनते जा रहे हैं।
- उदाहरण के लिए: हाल के संघर्ष में ईरान ने इजरायल के खिलाफ खुफिया जानकारी जुटाने, निगरानी और टोही (ISR) तथा हवाई हमलों के लिए UAVs का उपयोग किया।
- रणनीतिक क्षेत्र में स्वायत्तता हेतु: UAV मिशन सिस्टम, इलेक्ट्रॉनिक्स और सुरक्षित आपूर्ति श्रृंखला में आत्मनिर्भरता प्राप्त करने के लिए आवश्यक है।
- सैन्य क्षमता: हाल के भारत-पाकिस्तान और भारत-चीन संघर्षों ने निगरानी, सटीक हमला करने की क्षमता, रणनीतिक लचीलापन और सटीक कार्रवाई की आवश्यकता को बढ़ा दिया है।
- सामरिक और लॉजिस्टिक आवश्यकता: ऊंचाई वाले सैन्य ठिकानों, द्वीपीय क्षेत्रों, संवेदनशील अंतिम खुले मार्गों और युद्ध क्षेत्र स्तर की गतिशीलता के लिए UAVs की आवश्यकता होती है।
UAV में संप्रभु क्षमता निर्माण के लिए आवश्यकताएं
- प्रमाणन: UAV विनिर्माण में सुरक्षित और विश्वसनीय सैन्य UAV मानकों को सुनिश्चित करना।
- परीक्षण अवसंरचना: उद्योग, स्टार्टअप्स और रक्षा संगठनों के लिए साझा ड्रोन परीक्षण और सिमुलेशन सुविधाएं विकसित करना।
- खरीद: विश्वसनीयता और ड्रोन के प्रदर्शन पर ध्यान केंद्रित करना।
- विश्वसनीय तकनीक: सुरक्षित स्वदेशी पुर्जे और सॉफ्टवेयर विकसित करना।
- आपूर्ति श्रृंखला: UAV के महत्वपूर्ण पुर्जों के लिए MSMEs, स्टार्टअप्स और रक्षा PSUs को शामिल करते हुए मजबूत घरेलू विनिर्माण प्रणाली स्थापित करना।
भारत में UAV/ड्रोन
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