रक्षा मंत्री ने यह टिप्पणी महाराष्ट्र के शिरडी में निजी क्षेत्र की कंपनी ‘नाइब ग्रुप’ के रक्षा विनिर्माण परिसर के उद्घाटन के दौरान की।
- इस अवसर पर भारत की पहली ‘300 किलोमीटर की यूनिवर्सल रॉकेट लॉन्चिंग सिस्टम—सूर्यास्त्र' (Suryastra) का भी सफल परीक्षण किया गया।
रक्षा क्षेत्रक में निजी क्षेत्र की भागीदारी का महत्व:
- आर्थिक सुदृढ़ता और राष्ट्रीय सुरक्षा को बढ़ावा: वर्तमान समय में व्यापार, आपूर्ति श्रृंखला और दुर्लभ मृदा खनिज (रेयर अर्थ मिनरल्स) तक को रणनीतिक हथियार की तरह उपयोग किया जा रहा है।
- सशक्तीकरण और रोजगार: यह MSMEs और लघु उद्योगों को बढ़ावा देने के साथ-साथ स्थानीय अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ बनाएगा और उन्हें अत्याधुनिक तकनीकी कौशल से युक्त बनाएगा।

- रक्षा अनुसंधान: अनुसंधान और विकास (R&D) कार्यों में निजी क्षेत्र की आय, तकनीकी क्षमता और उत्पादन क्षमताओं का लाभ उठाया जा सकता है।
- रक्षा उद्यमिता: यह सरकारी संस्थानों और सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों में आमतौर पर नौकरशाही संबंधी बाधाओं को दूर करेगा।
- स्वदेशीकरण को बढ़ावा: भारत ने वर्ष 2029 तक 3 लाख करोड़ रुपये मूल्य के रक्षा उत्पादन का लक्ष्य रखा है।
रक्षा क्षेत्रक में निजी क्षेत्र की भागीदारी को बढ़ावा देने के लिए प्रमुख सुधार:
- उदारीकृत FDI नीति: रक्षा क्षेत्रक में स्वचालित मार्ग से 74% तक प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) की अनुमति दी गई है।
- देश में विनिर्मित उत्पादों की खरीद को प्राथमिकता: 'रक्षा अधिग्रहण प्रक्रिया (DAP)-2020' के तहत पूंजीगत वस्तुओं की खरीद घरेलू स्रोतों से करने को प्राथमिकता दी जा रही है।
- रक्षा औद्योगिक गलियारे: रक्षा विनिर्माण को बढ़ावा देने के लिए उत्तर प्रदेश और तमिलनाडु में रक्षा-औद्योगिक गलियारे स्थापित किए गए हैं।
- साझेदार के रूप में उद्योग: यह निजी क्षेत्र की कंपनियों, स्टार्ट-अप्स और MSMEs को शामिल करते हुए सहयोगात्मक तंत्र को बढ़ावा देता है, जैसे-रक्षा उत्कृष्टता के लिए नवाचार (iDEX) जैसी पहलें।