IBC अधिनियम को 2016 में लागू किया गया था और 2026 में इसमें अंतिम बार संशोधन हुआ था। यह संहिता कंपनियों, साझेदारी फर्मों और व्यक्तियों के दिवालियापन से संबंधित मामले के समाधान और पुनर्गठन वाले कानूनों को एकीकृत करने वाला भारत का मुख्य कानून है।
IBC की उपलब्धियां:
- NPA में व्यापक कमी: बैंकों के सकल गैर-निष्पादित आस्तियां (GNPA) अनुपात वित्त वर्ष 2018 के 11.5% से कम होकर वित्त वर्ष 2026 में केवल 2.3% रह गया।
- बेहतर वसूली: वित्त वर्ष 2025 में बैंकों की कुल वसूली (रिकवरी) में 52.3% हिस्सा IBC का था, और कुल वसूली ₹4.11 लाख करोड़ के पार पहुंच गई।
- PSB का रिकॉर्ड लाभ: सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों (PSB) ने वित्त वर्ष 2025 में ₹1.98 लाख करोड़ का संयुक्त निवल लाभ दर्ज किया।
- नियंत्रण में बदलाव: IBC ने निर्णय लेने की शक्ति को कर्ज न चुकाने वाले प्रमोटरों से हटाकर ऋणदाताओं (क्रेडिटर्स) के हाथों में सौंप दिया।
IBC से संबद्ध चुनौतियां:
- कॉरपोरेट दिवाला समाधान में देरी: IBC के अनुसार मामला 330 दिनों में सुलझ जाना चाहिए, लेकिन मार्च 2026 तक औसतन इसमें 744 दिन लग रहे हैं।
- कम राशि की वसूली: परिसंपत्तियों से वसूली, परिसमापन मूल्य (Liquidation Value) की तुलना में लगभग 30% घट गई है।
- क्रियान्वयन में कमी: इस संहिता में 'दिवाला और शोधन अक्षमता कोष' बनाने का प्रावधान था, लेकिन वह अभी तक सक्रिय नहीं है।
- प्रौद्योगिकी के उपयोग की समस्या: ई-कोर्ट होने के बावजूद, कुछ न्यायाधीशों में प्रौद्योगिकी संबंधी दक्षता का अभाव एक समस्या है।
आगे की राह:
- संस्थाओं की क्षमता बढ़ाना: राष्ट्रीय कम्पनी विधि अधिकरण (NCLT) या राष्ट्रीय कम्पनी विधि अपीलीय अधिकरण (NCLAT) की पीठों की संख्या बढ़ाने और विशेष 'फास्ट-ट्रैक' अदालतें गठित करने की आवश्यकता है।
- व्यक्तिगत दिवाला समाधान का क्रियान्वयन: साझेदारी और स्वामित्व वाली फर्मों के डिफॉल्ट को सुलझाने के लिए व्यक्तिगत दिवाला समाधान प्रक्रिया को पूरी तरह से लागू करने की आवश्यकता है।
- परिसंपत्ति के मूल्य के आकलन में सुधार: कंपनी की वास्तविक क्षमता को बेहतर तरीके से दर्शाने और ऋणदाताओं को होने वाले नुकसान को कम करने के लिए परिसमापन मूल्य (लिक्विडेशन वैल्यू) की जगह उद्यम के मूल्य (एंटरप्राइज वैल्यू) को महत्व दिया जाए।
दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता (IBC), 2016 के बारे में
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