सुर्ख़ियों में क्यों?
संसद ने दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता (संशोधन) विधेयक, 2026 पारित किया।
दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता (IBC), 2016 के बारे में
- इसे कॉर्पोरेट व्यक्तियों, साझेदारी फर्मों और व्यक्तिगत मामलों के पुनर्गठन तथा दिवाला समाधान से संबंधित विधियों को एकीकृत और संशोधित करने के लिए लागू किया गया था ताकि इनका समयबद्ध तरीके से निस्तारण हो सके।
- दिवाला (इन्सॉल्वेंसी) ऐसी स्थिति है जिसमें व्यक्ति या कंपनियां अपने बकाया ऋण को चुकाने में असमर्थ होती हैं।
- उद्देश्य: दिवाला से संबद्ध परिसंपत्तियों की अधिकतम पुनर्प्राप्ति सुनिश्चित करना, उद्यमिता को बढ़ावा देना, ऋण की उपलब्धता को बढ़ाना और सभी हितधारकों के हितों का ध्यान रखना।
- इस अधिनियम के तहत भारतीय दिवाला और शोधन अक्षमता बोर्ड (Insolvency and Bankruptcy Board of India: IBBI) की स्थापना की गई।
- IBC, 2016 में पूर्व में किए गए संशोधन
- IBC (संशोधन) अधिनियम, 2019: इसके तहत कॉरपोरेट दिवाला समाधान प्रक्रिया (Corporate Insolvency Resolution Process: CIRP) को पूरा करने के लिए 330 दिनों की समय-सीमा तय की गई। साथ ही, राष्ट्रीय कंपनी विधि अधिकरण (National Company Law Tribunal: NCLT) के लिए यह अनिवार्य किया गया कि वह 14 दिनों के भीतर यह तय करें कि कंपनी कर्ज चुकाने में विफल रही है या नहीं। इसके अलावा, व्यक्तिगत गारंटरों के विरुद्ध भी दिवाला-समाधान प्रक्रिया प्रारंभ करने की अनुमति दी गई।
- IBC द्वितीय संशोधन अधिनियम, 2020: कोविड महामारी के दौरान भारतीय व्यवसायों को बड़ी राहत देते हुए, इस अधिनियम ने अस्थायी रूप से कॉरपोरेट दिवाला समाधान प्रक्रिया (CIRP) प्रारंभ करने पर रोक लगा दी थी।
- IBC (संशोधन) अधिनियम, 2021: इसका उद्देश्य सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (MSMEs) के लिए दिवाला समाधान की अधिक प्रभावी और सरल वैकल्पिक व्यवस्था प्रदान करना था।
- IBC की प्रमुख उपलब्धियां:
- 1376 कंपनियों का समाधान: IBC के माध्यम से अब तक 1376 कंपनियों के दिवाला मामलों का निस्तारण किया गया है। इससे ऋणदाताओं को 4.11 लाख करोड़ रुपये की राशि पुनर्प्राप्त करने में सहायता मिली है।
- वित्तीय ऋणदाताओं ने इस प्रक्रिया के तहत अपने कुल दावों का 64% से अधिक हिस्सा वापस प्राप्त कर लिया है।
- NPAs (गैर-निष्पादित आस्तियां) में कमी: उदाहरण के तौर पर, 2016 में सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों का सकल NPA लगभग 14.58% था, जो कम होकर 2025 में 2.3% रह गया।
- तनावग्रस्त परिसंपत्तियों की पुनर्प्राप्ति में सुधार: इन परिसंपत्तियों की वापसी दर में बहुत सुधार हुआ है और यह 2024-25 में बढ़कर 36.6% हो गई है (जो पहले केवल 15 से 20% हुआ करती थी)।
- 1376 कंपनियों का समाधान: IBC के माध्यम से अब तक 1376 कंपनियों के दिवाला मामलों का निस्तारण किया गया है। इससे ऋणदाताओं को 4.11 लाख करोड़ रुपये की राशि पुनर्प्राप्त करने में सहायता मिली है।

IBC (संशोधन) अधिनियम, 2026 के मुख्य प्रावधान
- नई ऋणदाता-प्रवर्तित दिवाला समाधान प्रक्रिया (Creditor-Initiated Insolvency Resolution Process: CIIRP): यह कुछ चुनिंदा वित्तीय संस्थानों के लिए प्रारंभ की गई नई आउट-ऑफ-कोर्ट (न्यायालय के बाहर) दिवाला-समाधान व्यवस्था है।
- सीमा-पार और समूह दिवाला समाधान: यह अधिनियम सीमा-पार और समूह दिवाला समाधान (Group Insolvency) के लिए एक ढांचा प्रदान करता है। यह अंतरराष्ट्रीय निवेशकों का विश्वास बढ़ाने और जटिल कॉर्पोरेट संरचनाओं वाले मामलों के निस्तारण के लिए बहुत महत्वपूर्ण है।
- क्लीन स्लेट सिद्धांत: यह स्पष्ट रूप से "क्लीन-स्लेट सिद्धांत (Clean-Slate Principle)" को सुदृढ़ करता है, जिसके अनुसार एक बार समाधान योजना (Resolution Plan) को स्वीकृति मिल जाने के बाद कॉर्पोरेट देनदार के विरुद्ध सभी दावे समाप्त माने जाएंगे (जब तक अन्यथा निर्दिष्ट न किया गया हो)।
- ऋणदाताओं की समिति (CoC) की शक्तियों में वृद्धि: परिसमापक (liquidator) को नियुक्त करने या हटाने और परिसमापन (liquidation) प्रक्रिया की निगरानी करने की शक्ति अब ऋणदाताओं की समिति के पास और अधिक स्पष्ट होगी।
- त्वरित समाधान के लिए सख्त समय-सीमा:
- परिसमापन की प्रक्रिया: इसे 180 दिनों के भीतर पूरा करना होगा (जिसे अधिकतम अतिरिक्त 90 दिनों तक बढ़ाया जा सकता है)।
- आवेदन की स्वीकृति: डिफॉल्ट होने के 14 दिनों के भीतर NCLT को दिवाला-समाधान हेतु आवेदन स्वीकार करना होगा।
- दिवाला-समाधान योजना पर निर्णय: NCLT को सौंपी गई समाधान योजनाओं को 30 दिनों के भीतर स्वीकृति देनी होगी या उन्हें अस्वीकार करना होगा।
- अपीलों का निस्तारण: विलंब से बचने के लिए राष्ट्रीय कंपनी विधि अपीलीय अधिकरण (NCLAT) को किसी भी अपील का निस्तारण 3 माह के भीतर करना होगा।
- "सुरक्षित ऋणदाता" (Secured Creditor) के दायरे में स्पष्टता: सरकारी बकाया राशि (जैसे टैक्स, वैधानिक लेवी आदि) को दिवाला समाधान से प्राप्त की गई राशि के वितरण में प्राथमिकता प्राप्त 'सुरक्षित ऋणदाता' नहीं माना जाएगा।
- अन्य प्रावधान: निरर्थक याचिकाओं पर दंड; अवॉइडेंस ट्रांजैक्शन तथा धोखाधड़ीपूर्ण या गलत कारोबार जैसे पदों की नई परिभाषाएं दी गई हैं, आदि।
IBC (संशोधन) अधिनियम, 2026 का महत्व
- त्वरित समाधान: आवेदन स्वीकार करने, समाधान योजनाओं की स्वीकृति देने और अपीलों के निस्तारण के लिए तय की गई सख्त समय-सीमा से समाधान में विलंब कम होगा और निर्णय लेने की प्रक्रिया तेज होगी।
- ऋणदाताओं की सशक्त भूमिका: ऋणदाताओं की समिति (CoC) को और अधिक अधिकार देने से जवाबदेही बढ़ेगी और परिसंपत्ति पुनः प्राप्ति के बेहतर परिणाम सामने आएंगे।
- व्यवसाय की निरंतरता: नई 'CIIRP' प्रणाली और कंपनी के मालिक के पास प्रबंधन बने रहना (Debtor-in-possession) मॉडल से कंपनियां समाधान प्रक्रिया के क्रम में भी अपना संचालन जारी रख सकेंगी, जिससे उनकी वैल्यू (मूल्य) बनी रहेगी।
- वैश्विक मानकों के संगत: समूह और सीमा-पार दिवाला समाधान प्रावधानों को शामिल करने से भारत की दिवाला समाधान प्रक्रिया अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप हो गई है, जिससे विदेशी निवेशकों का भरोसा बढ़ेगा।
IBC (संशोधन) अधिनियम, 2026 से जुड़ी चिंताएं
- CIIRP से जुड़ी चिंताएं:
- CIIRP प्रक्रिया केवल केंद्र सरकार द्वारा कुछ चयनित वित्तीय संस्थानों द्वारा ही प्रारंभ की जा सकती है। इससे कुछ वित्तीय संस्थानों को दूसरों पर प्राथमिकता मिल सकती है।
- CIIRP प्रारंभ करने की शर्त अभी भी 'डिफ़ॉल्ट होना' (कर्ज न चुका पाना) ही है। तब तक संपत्ति का मूल्य (वैल्यू) बहुत गिर चुका होता है, जो इस अधिनियम के मूल उद्देश्य अर्थात 'संपत्ति का अधिकतम मूल्य पुनः प्राप्त करना' को कमजोर करता है।
- न्यायालय के बाहर समझौते के प्रावधान को सीमित रखना: यह अधिनियम दिवाला-समाधान याचिका को वापस लेने की अनुमति केवल तभी देता है जब 'ऋणदाताओं की समिति' (CoC) गठित हो चुकी हो और 'समाधान योजना' के लिए पहला आमंत्रण जारी न हुआ हो।
- याचिका वापसी के लिए CoC के 90% सदस्यों की सहमति अनिवार्य होगी। यह प्रावधान प्रक्रिया को कठिन बना सकता है।
- परिसमापक (Liquidator) की शक्तियां: परिसमापक से दावों पर निर्णय लेने की शक्तियां वापस ले ली गई हैं। इससे परिसमापन प्रक्रिया में वह 'निश्चितता' समाप्त हो जाती है जो बहुत आवश्यक होती है। परिसमापन के क्रम में जब परिसंपत्ति का बंटवारा होता है, तो सभी पक्षों के अधिकार अंतिम रूप से समाप्त हो जाते हैं, ऐसे में परिसमापक की शक्तियों में कमी से प्रक्रिया अधूरी बनी रह सकती है।
निष्कर्ष
उपर्युक्त नए संशोधनों का उद्देश्य व्यावहारिक चुनौतियों को दूर करना, विश्व भर में अपनाई जा रही सर्वोत्तम पद्धतियों को शामिल करना और 2016 में इस अधिनियम के लागू होने के बाद मिले अनुभवों को प्रतिबिंबित करना है। ये संशोधन कंपनियों और व्यक्तियों के बीच होने वाली प्रक्रिया से संबद्ध देरी और अधिनियम की व्याख्या से जुड़ी समस्याओं को सुलझाने में सहायता करेंगे।