फिजिकल रिसर्च लेबोरेटरी (अहमदाबाद) के शोधकर्ताओं ने चंद्रयान-2 ऑर्बिटर के 'डुअल-फ्रीक्वेंसी सिंथेटिक अपर्चर रडार' (DFSAR) से प्राप्त डेटा का विश्लेषण करके यह महत्वपूर्ण खोज की है।
- DFSAR चंद्रमा का अध्ययन करने के लिए बनाया गया पहला पूर्णतः ध्रुवणमापी (polarimetric) सिंथेटिक अपर्चर रडार है।
शोध के मुख्य बिंदु
- केंद्रित क्षेत्र: शोध का केंद्र दोहरी छाया वाले क्रेटरों पर था, जैसे कि फॉस्टिनी क्रेटर। ये स्थायी छायायुक्त क्षेत्रों में बड़े स्थायी छायायुक्त क्रेटरों के भीतर स्थित छोटे क्रेटर हैं।
- स्थायी रूप से छाया में रहने के कारण ये क्षेत्र अत्यंत ठंडे हैं जहाँ तापमान लगभग -248.15 डिग्री सेल्सियस तक रहता है।
- मुख्य साक्ष्य: शोध में रडार संकेतों और क्रेटरों के 'लोबेट रिम आकारिकी' का उपयोग किया गया।
- लोबेट रिम आकारिकी (Lobate rim morphology) से आशय ऐसे क्रेटर किनारे से है, जिसकी बनावट बहाव जैसी या उभरे हुए खंडों (लोब) वाली दिखाई देती है।।
शोध के निष्कर्षों का महत्व
- चंद्रमा के स्थानीय संसाधनों का उपयोग (In-Situ Resource Utilisation: ISRU): चंद्रमा पर उपलब्ध स्थानीय संसाधनों का उपयोग करने का अर्थ है कि अंतरिक्ष एजेंसियों को प्रत्येक एक किलोग्राम सामग्री को पृथ्वी से उच्च लागत पर भेजने की आवश्यकता नहीं होगी। उदाहरण के लिए—पेयजल और रॉकेट ईंधन।
- इलेक्ट्रोलिसिस के माध्यम से जल को हाइड्रोजन और ऑक्सीजन में अलग-अलग करने से पेयजल तरल रॉकेट ईंधन में बदल जाता है।
- वैज्ञानिक शोध में अग्रणी बनना: भारत केवल चंद्रमा पर मिशन भेजने की अंधी दौड़ में शामिल नहीं है, बल्कि वह ऐसे महत्वपूर्ण डेटा और जानकारी प्रदान कर रहा है, जो भविष्य के चंद्र अभियानों में उपयोगी सिद्ध हो सकते हैं। यह नासा के नेतृत्व वाले आर्टेमिस अकॉर्ड्स के उद्देश्यों के अनुरूप है, जो पारदर्शी तरीके से डेटा साझा करने पर बल देता है।
- भारत ने भी आर्टेमिस अकॉर्ड्स पर हस्ताक्षर किए हैं।
चंद्रयान-2 के बारे में
भारत के अन्य चंद्र मिशन
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