हाल ही में, राष्ट्रपति ने संविधान के अनुच्छेद 123 के तहत 'उच्चतम न्यायालय (न्यायाधीशों की संख्या) संशोधन अध्यादेश, 2026' जारी किया। इस अध्यादेश का उद्देश्य लंबित मामलों की संख्या को देखते हुए उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों की संख्या 34 से बढ़ाकर 38 (मुख्य न्यायाधीश सहित) करना है।
- 26 जनवरी, 1950 को उच्चतम न्यायालय की स्थापना के बाद से यह 7वीं बार है, जब ‘उच्चतम न्यायालय (न्यायाधीशों की संख्या) अधिनियम, 1956’ की धारा 2 के तहत न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाई गई है।
लंबित मामलों की वर्तमान स्थिति (नेशनल ज्यूडिशियल डेटा ग्रिड के अनुसार):
- उच्चतम न्यायालय (SC) में: लगभग 93,000 मामले लंबित हैं, जिनमें 22 मामले पांच-न्यायाधीशों की संविधान पीठ, 5 मामले सात-न्यायाधीशों की संविधान पीठ और 2 मामले नौ-न्यायाधीशों की संविधान पीठ के समक्ष लंबित हैं।
- अधीनस्थ न्यायालयों में: इनमें स्थिति और अधिक गंभीर है। उच्च न्यायालयों में 6.4 मिलियन (64 लाख) से अधिक और जिला न्यायालयों में लगभग 49 मिलियन (4.9 करोड़) मामले लंबित हैं।
न्यायालयों में लंबित मामलों के कारण:
- संख्या बढ़ाने का सीमित प्रभाव: पूर्व के अनुभवों (2008 और 2019) से पता चलता है कि केवल न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाने से लंबित मामले स्थायी रूप से कम नहीं होते, क्योंकि मामलों की जटिलता भी बढ़ रही है।
- न्यायाधीश-जनसंख्या अनुपात की कमी: भारत में प्रति 10 लाख व्यक्तियों पर केवल 21 न्यायाधीश हैं, जबकि विधि आयोग की 120वीं रिपोर्ट ने 50 न्यायाधीशों का अनुपात बनाए रखने का सुझाव दिया था।
- मूल दायित्व का कमजोर होना: संविधान के अनुच्छेद 136 के तहत विशेष अनुमति याचिकाओं (स्पेशल लीव पिटीशन) को नियमित रूप से स्वीकार किए जाने के कारण उच्चतम न्यायालय अत्यधिक बोझ वाले अपीलीय न्यायालय में बदल गया है।
- वित्तीय संसाधन की कमी: भारत अपनी जीडीपी का केवल 0.1% ही न्यायपालिका पर व्यय करता है।
- वादी के रूप में सरकार: लगभग 50% अभियोजनों के लिए सरकार जिम्मेदार है।
- व्यवस्थागत कमियां: मामलों की प्रारंभिक सुनवाई में प्रक्रियागत देरी, अवसंरचना में कमी तथा अधीनस्थ कर्मचारियों की कमी जैसी समस्याएं विद्यमान हैं।
सरकारी पहलें:
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