भारत में दहेज मृत्यु सामाजिक संकट का रूप ले रही है | Current Affairs | Vision IAS

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  • एनसीआरबी 2024 के आंकड़ों से पता चलता है कि भारत में दहेज से संबंधित 5,737 मौतें हुईं, जिनमें उत्तर प्रदेश, बिहार और मध्य प्रदेश में सबसे अधिक मामले दर्ज किए गए।
  • कानूनी ढांचे में दहेज निषेध अधिनियम, 1961, बीएनएस की धारा 80 और 85 तथा घरेलू हिंसा अधिनियम, 2005 शामिल हैं।
  • सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों में दहेज विरोधी पुलिस अधिकारियों की नियुक्ति, आधिकारिक प्रशिक्षण और दहेज से संबंधित हिंसा के मामलों के शीघ्र निपटान पर जोर दिया गया है।

In Summary

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) की 'भारत में अपराध 2024' रिपोर्ट के अनुसार, भारत में दहेज से जुड़ी हिंसा के कारण प्रतिदिन लगभग 16 महिलाओं की मौत हो जाती है।

  • 'दहेज प्रतिषेध अधिनियम, 1961' के अनुसार, ‘दहेज से आशय कोई ऐसी संपत्ति या मूल्यवान वस्तु से है, जो  विवाह से पहले, विवाह के समय या विवाह के पश्चात विवाह के एक पक्षकार द्वारा दूसरे पक्षकार को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से दी जाती है या दी जाने के लिए करार की गई है।

वर्तमान स्थिति (NCRB 2024 रिपोर्ट के अनुसार)

  • महिलाओं के विरुद्ध अपराध: कुल 4,41,534 दर्ज मामलों में से 27.2% मामले 'पति द्वारा या पति के नातेदारों द्वारा क्रूरता' के दर्ज किए गए।
  • दहेज मृत्यु: लंबे समय में थोड़ी गिरावट के बावजूद, भारत में वर्ष 2024 में दहेज से जुड़ी 5,737 मौतें दर्ज की गईं।
    • सर्वाधिक मामले: उत्तर प्रदेश (2,038) में सर्वाधिक मामले दर्ज किए गए। इसके उसके बाद बिहार और मध्य प्रदेश में दर्ज किए गए।

संबंधित विधिक प्रावधान

  • दहेज प्रतिषेध अधिनियम, 1961: दहेज लेने, देने या उसकी मांग करने को आपराधिक कृत्य बनाया गया है।
  • भारतीय न्याय संहिता (BNS):
    • धारा 80 (पूर्व में IPC की धारा 304B): दहेज मृत्यु के लिए कठोर दंड का प्रावधान करती है।
    • धारा 85 (पूर्व में IPC की धारा 498A): पति या उसके नातेदारों द्वारा महिला के साथ की गई क्रूरता के लिए दंड का प्रावधान करती है।
  • साक्ष्य: भारतीय साक्ष्य अधिनियम (BSA) की धारा 118 (पूर्व में साक्ष्य अधिनियम 1872 की धारा 113B) के तहत, आरोपी के खिलाफ अपराध सिद्ध करने के लिए 'दोषी होने की धारणा' (Presumption of guilt) को आधार माना जाता है। 
  • घरेलू हिंसा: 'घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005' महिलाओं को घर में होने वाली हिंसा से संरक्षण के लिए लागू किया गया है।

उच्चतम न्यायालय के 2025 के निर्देश

'उत्तर प्रदेश राज्य बनाम अजमल बेग' वाद में उच्चतम न्यायालय ने निम्नलिखित निर्देश दिए हैं:

  1. दहेज प्रतिषेध अधिकारियों (DPOs) की नियुक्ति: इनकी नियुक्ति दहेज प्रतिषेध अधिनियम, 1961 अधिनियम के तहत सुनिश्चित की जाए।
  2. अधिकारियों का प्रशिक्षण: पुलिस और न्यायिक अधिकारियों को नियमित रूप से प्रशिक्षण दिया जाए।
  3. लंबित मामलों का शीघ्र निस्तारण: उच्च न्यायालयों से लंबित मामलों की संख्या की समीक्षा करने और उनका शीघ्र निस्तारण करने का अनुरोध किया गया है।
  4. अन्य निर्देश: जिला प्रशासन द्वारा दहेज के खिलाफ जमीनी स्तर पर जागरूकता कार्यक्रम चलाए जाएं और जागरूकता बढ़ाने के लिए स्कूली शिक्षा के पाठ्यक्रम में बदलाव किया जाए।
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दोषी होने की धारणा (Presumption of guilt)

यह एक कानूनी सिद्धांत है जहां कुछ विशेष परिस्थितियों में, अदालत यह मान लेती है कि आरोपी दोषी है जब तक कि वह अपनी बेगुनाही साबित न कर दे। भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 118 (दहेज मृत्यु से संबंधित) ऐसे ही एक प्रावधान का उदाहरण है।

दहेज प्रतिषेध अधिकारी (DPOs)

ये अधिकारी दहेज प्रतिषेध अधिनियम, 1961 के प्रावधानों को लागू करने के लिए नियुक्त किए जाते हैं। इनका कार्य दहेज के खिलाफ जागरूकता फैलाना और अधिनियम के उल्लंघन की जांच करना है।

घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005

यह कानून महिलाओं को उनके निवास स्थान (चाहे वह पैतृक घर हो या वैवाहिक घर) में होने वाली विभिन्न प्रकार की घरेलू हिंसा से सुरक्षा प्रदान करता है। इसमें शारीरिक, भावनात्मक, मौखिक, यौन और आर्थिक शोषण शामिल है।

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