शक्तिशाली देशों की कार्रवाइयों से अंतरराष्ट्रीय विधियों और नियम आधारित व्यवस्थाओं का गंभीर उल्लंघन हुआ है | Current Affairs | Vision IAS

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In Summary

  • आधुनिक अंतरराष्ट्रीय कानून को अक्सर महाशक्तियों द्वारा नजरअंदाज कर दिया जाता है, क्योंकि यह कानून लगातार लागू किए जाने की बजाय उनके अपने हितों की पूर्ति करता है।
  • प्रमुख उल्लंघनों में संयुक्त राष्ट्र चार्टर, यूएनसीएलओएस, मानवाधिकार कानून, हथियार नियंत्रण और पर्यावरण संबंधी प्रतिबद्धताएं शामिल हैं, जिन्हें यूएनएससी और आईसीसी जैसी संस्थाओं द्वारा कमजोर किया गया है।
  • आगे बढ़ने का रास्ता बहुपक्षीय संस्थानों को मजबूत करने, हथियार नियंत्रण को पुनर्जीवित करने, मानदंडों का अनुपालन सुनिश्चित करने और कूटनीति के माध्यम से नियम-आधारित आचरण को बढ़ावा देने में निहित है।

In Summary

आधुनिक अंतर्राष्ट्रीय विधि को लेकर यह आलोचना की जाती है कि यह हमेशा निष्पक्ष और प्रभावी नहीं होती, तथा इनका प्रवर्तन सभी देशों पर समान रूप से नहीं होता। कई बार महाशक्तियां अंतरराष्ट्रीय नियमों और विधियों का पालन तभी करती हैं, जब इससे उनके राष्ट्रीय या रणनीतिक हितों को लाभ होता है। 

  • यदि कोई नियम इन देशों के हितों के विरुद्ध हो, तो वे उसे अनदेखी करने या अपने अनुसार व्याख्या करने का प्रयास कर सकते हैं।  

हाल के वर्षों में अंतरराष्ट्रीय विधियों का उल्लंघन:

  • संयुक्त राष्ट्र चार्टर के 'बल प्रयोग पर प्रतिबंध' का उल्लंघन: उदाहरण के लिए, रूस द्वारा यूक्रेन पर आक्रमण (2022) तथा अमेरिका-इजरायल द्वारा ईरान के विरुद्ध सैन्य कार्रवाई/युद्ध (2026)।
  • संयुक्त राष्ट्र समुद्री विधि कन्वेंशन (UNCLOS) की अवहेलना: उदाहरण के लिए, दक्षिण चीन सागर पर स्थायी मध्यस्थता न्यायालय (Permanent Court of Arbitration) के निर्णय को चीन द्वारा स्वीकार न करना; तथा होर्मुज जलसंधि में अमेरिका और ईरान द्वारा समुद्री नाकाबंदी जैसी कार्रवाइयां।
  • अंतरराष्ट्रीय मानवीय एवं मानवाधिकार कानूनों का उल्लंघन: उदाहरण के लिए, गाज़ा में बड़े पैमाने पर आम नागरिकों की मृत्यु तथा शिनजियांग में उइगर समुदाय के प्रति चीन का दुर्व्यवहार। 
  • शस्त्र-नियंत्रण समझौतों का कमजोर होना: उदाहरण के लिए, अमेरिका और रूस के बीच इंटरमीडिएट रेंज परमाणु बल (INF) संधि का समाप्त होना तथा ईरान के परमाणु कार्यक्रम का तेजी से प्रसार, आदि। 
  • पर्यावरण संरक्षण से संबंधित प्रतिबद्धताओं की विफलता: वैश्विक जलवायु समझौतों के बावजूद अमेज़न के जंगलों में अवैध कटाई जारी है।
  • वैश्विक संस्थाओं का कमजोर होना: उदाहरण के लिए, संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में गतिरोध और प्रमुख शक्तिशाली देशों के खिलाफ कार्रवाई करने में अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय की असमर्थता।

आगे की राह 

  • बहुपक्षीय संस्थाओं को सशक्त बनाना: संयुक्त राष्ट्र जैसी संस्थाओं को अधिक प्रतिनिधित्व वाली, जवाबदेह और प्रभावी बनाने की आवश्यकता है ताकि वे नियमों को सख्ती से लागू कर सकें।
  • हथियार नियंत्रण व्यवस्थाओं को पुनर्बहाल करना: पुराने समझौतों को संशोधित करने और सभी देशों द्वारा उनका अनुपालन सुनिश्चित करने की आवश्यकता है।
  • वैश्विक मानदंडों के अनुपालन को सुनिश्चित करना: पर्यावरण समझौतों के प्रति दायित्वों, मानवाधिकारों और मानवीय कानूनों के लिए निगरानी, वित्तपोषण और प्रवर्तन को सुदृढ़ करने की आवश्यकता है। 
  • नियम-आधारित आचरण को बढ़ावा देना: कूटनीति, संयम और विवादों के शांतिपूर्ण समाधान को प्रोत्साहित करना चाहिए।

अंतरराष्ट्रीय विधि क्या है?

अंतरराष्ट्रीय विधि नियम-आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था की आधारशिला है, जो देशों के बीच संबंधों को नियंत्रित करती है, मानवाधिकारों की रक्षा करती है, वैश्विक साझा संसाधनों का संरक्षण करती है तथा शांति और सुरक्षा को बढ़ावा देती है।

  • संस्थापक फ्रेमवर्क और संधियां: संयुक्त राष्ट्र चार्टर (1945), वियना कन्वेंशन (1969)।
  • मानवाधिकार और मानवीय कानून: जिनेवा कन्वेंशन (1949), मानवाधिकारों की सार्वभौम घोषणा (UDHR, 1948)।
  • पर्यावरण कानून: मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल (1987), पेरिस समझौता (2016)।
  • वैश्विक कॉमन्स (समुद्र और अंतरिक्ष): UNCLOS (1982), बाह्य अंतरिक्ष संधि (1967)।
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बाह्य अंतरिक्ष संधि (1967)

एक अंतर्राष्ट्रीय संधि जो अंतरिक्ष के अन्वेषण और उपयोग को नियंत्रित करती है। यह संधि अंतरिक्ष को सभी देशों के लिए खुला बताती है और किसी भी राष्ट्र द्वारा इसे राष्ट्रीय संप्रभुता के लिए दावा करने से रोकती है।

पेरिस समझौता (2016)

यह जलवायु परिवर्तन पर एक ऐतिहासिक अंतरराष्ट्रीय समझौता है जिसका उद्देश्य वैश्विक तापमान वृद्धि को पूर्व-औद्योगिक स्तरों से 2 डिग्री सेल्सियस से काफी नीचे रखना है, और 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित करने के प्रयासों को जारी रखना है।

मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल (1987)

यह एक अंतरराष्ट्रीय संधि है जिसे ओजोन परत को नष्ट करने वाले पदार्थों के उत्पादन को चरणबद्ध तरीके से समाप्त करने के लिए डिज़ाइन किया गया है। यह एक सफल बहुपक्षीय पर्यावरण समझौता माना जाता है।

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