नीति आयोग ने “भारत के सेमीकंडक्टर उद्योग का भविष्य” शीर्षक से रोडमैप जारी किया | Current Affairs | Vision IAS

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  • भारत का लक्ष्य 2035 तक 120-150 बिलियन अमेरिकी डॉलर की सेमीकंडक्टर मूल्य श्रृंखला विकसित करना है, जिसमें 2030 तक 10-13% वैश्विक बाजार हिस्सेदारी और 15-25% चिप आत्मनिर्भरता हासिल करना शामिल है।
  • इस रणनीति में अनुसंधान एवं विकास, नीति, उन्नत पैकेजिंग और परिपक्व केंद्रों पर उत्पादन केंद्रित करना, प्रतिभा विकास और अंतर्राष्ट्रीय साझेदारी शामिल हैं।
  • इस तात्कालिकता का कारण 2035 तक अनुमानित 200 अरब अमेरिकी डॉलर की घरेलू मांग, आयात पर महत्वपूर्ण निर्भरता, विदेशी मुद्रा की कमी और राष्ट्रीय सुरक्षा जोखिम हैं।

In Summary

रोडमैप के मुख्य लक्ष्य 

  • वर्ष 2035 तक 120-150 बिलियन डॉलर की एक मजबूत सेमीकंडक्टर मूल्य श्रृंखला बनाना।
  • वैश्विक सेमीकंडक्टर बाजार में 10–13% हिस्सेदारी प्राप्त करना तथा अत्याधुनिक पैकेजिंग और OSAT (आउटसोर्स्ड सेमीकंडक्टर असेंबली एवं टेस्टिंग) के क्षेत्र में विश्व के शीर्ष 3 प्रमुख केंद्रों में शामिल होना।
  • वर्ष 2030 तक सेमीकंडक्टर चिप विनिर्माण में 15–25% आत्मनिर्भरता प्राप्त करना, जिसे 2035 तक बढ़ाकर 35–50% करना। 
  • वर्ष 2035 तक देश में उपयोग होने वाली प्रत्येक चिप के मूल्य (वैल्यू चेन) का 55–70% घटक देश में ही उपलब्ध कराना।

रोडमैप: 5 मुख्य स्तंभ 

  • अग्रणी बनना (अनुसंधान एवं विकास तथा डिज़ाइन आईपी): अत्याधुनिक अनुसंधान और चिप डिज़ाइन में स्वदेशी क्षमताओं का विकास करना, ताकि 2035 तक 100 से अधिक उन्नत सेमीकंडक्टर बौद्धिक संपदा (IP) विकसित की जा सकें।
  • नीति और निवेश:
    • सेमीकंडक्टर उद्योग के विकास के लिए 135-180 बिलियन डॉलर का निवेश जुटाना।
    • पूर्ण प्रोत्साहन व्यवस्था के साथ एक स्वायत्त ‘राष्ट्रीय सेमीकंडक्टर नोडल एजेंसी’ की स्थापना करना, जो दीर्घकालिक और स्पष्ट नीतिगत दिशा प्रदान करे तथा सेमीकंडक्टर चिप की मांग को बढ़ावा दे।
  • उत्पादन : रणनीतिक रूप से उन क्षेत्रकों पर ध्यान केंद्रित करना जहाँ देश को स्वाभाविक बढ़त प्राप्त है (जैसे रक्षा और एयरोस्पेस), विशेष रूप से अत्याधुनिक पैकेजिंग, परिपक्व एवं कंपाउंड वेफर निर्माण (28–65 नैनोमीटर) तथा अति-महत्वपूर्ण (क्रिटिकल) सामग्रियों पर जोर देना। 
  • मानव संसाधन: एक व्यापक ‘राष्ट्रीय सेमीकंडक्टर प्रतिभा पिरामिड’ विकसित करना, जिसके माध्यम से फैब-रेडी क्लीनरूम तकनीशियनों से लेकर एडवांस्ड सिस्टम-स्तरीय समाधान विशेषज्ञों तक सभी स्तरों के कार्यबल को प्रशिक्षित किया जा सके।
  • साझेदारी: अति-महत्वपूर्ण खनिजों  (क्रिटिकल मिनरल्स) की आपूर्ति श्रृंखला को सुरक्षित करने, वैश्विक अनुसंधान एवं विकास (R&D) नेटवर्क से जुड़ने और प्रौद्योगिकी प्राप्ति में तेजी लाने के लिए अमेरिका, जापान और यूरोपीय संघ जैसे विश्वसनीय मित्रों तथा वैश्विक उद्योग जगत के साथ परिणाम-केंद्रित साझेदारियाँ स्थापित करना।

भारत के लिए अभी कदम उठाना क्यों आवश्यक है?

  • आर्थिक अवसर बढ़ाने के लिए:  भारत में सेमीकंडक्टर की मांग वर्ष 2035 तक 200 बिलियन डॉलर तक पहुंचने का अनुमान है (19% की चक्रवृद्धि वार्षिक वृद्धि दर के साथ)।  
  • निरंतर आपूर्ति पर खतरा को टालने के लिए: वर्तमान में भारत अपनी आवश्यकता का 90–95% सेमीकंडक्टर आयात करता है। वैश्विक संकट के समय इनकी आपूर्ति बाधित हो सकती है जिससे इन पर निर्भर उद्योग प्रभावित हो सकते हैं।
  • विदेशी मुद्रा की बचत हेतु: भारत ने 2017 से 2025 के बीच चिप के आयात पर लगभग 150 बिलियन डॉलर व्यय किए हैं। यह व्यय वर्ष 2035 तक प्रतिवर्ष 240 बिलियन डॉलर तक पहुँच सकता है।
  • राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए: रक्षा, एयरोस्पेस और UAVs के लिए आयातित चिप्स पर अत्यधिक निर्भरता रणनीतिक स्वायत्तता के लिए खतरा है।
  • सामाजिक प्रभाव: 5G/6G तकनीक, डिजिटल शिक्षा, कृषि और स्वास्थ्य-देखभाल सेवाओं के लिए स्वदेशी चिप्स का होना बहुत जरूरी है।
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