कोडाईकनाल सौर वेधशाला ने सौर चक्र के बारे में उपयोगी जानकारी प्रदान की है | Current Affairs | Vision IAS

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In Summary

  • सूर्य की सतह पर मौजूद विशाल संवहन कोशिकाएं, जिन्हें सुपरग्रैन्यूलेशन कहा जाता है, सौर चक्रों के प्रति प्रतिक्रिया करती हैं, जिससे पूर्वानुमान में सहायता मिलती है।
  • लगभग 11 साल के सौर चक्र में चुंबकीय क्षेत्र में उलटफेर, सौर न्यूनतम और अधिकतम के चरण और सूर्य के धब्बे, सौर ज्वालाएं और सीएमई जैसी घटनाएं शामिल हैं।
  • तमिलनाडु में 1899 में स्थापित कोडाइकनाल सौर वेधशाला, पृथ्वी के वायुमंडल के सौर तापन और मानसून के पैटर्न का अध्ययन करती है।

In Summary

हाल ही में कोडाईकनाल सौर वेधशाला ने यह पता लगाया है कि 'सुपरग्रेन्यूलेशन' सौर चक्रों (सोलर साइकल्स) के साथ कैसे अभिक्रिया करते हैं। इससे सौर चक्रों का पूर्वानुमान करना आसान हो गया है।

  • 'सुपरग्रेन्यूलेशन' सूर्य की सतह पर बनने वाले विशाल संवहन पैटर्न होते हैं। ये मिलकर सूर्य की सतह पर एक विशाल जाल जैसी संरचना बनाते हैं।

सौर चक्र के बारे में

  • सौर चक्र सूर्य की चुंबकीय गतिविधि या सक्रियता का एक आवर्ती क्रम है, जो लगभग प्रत्येक 11 वर्ष पर दोहराया जाता है।
    • प्रक्रिया: सूर्य आवेशित गैस (प्लाज्मा) से बना है जो एक विशाल चुंबकीय क्षेत्र उत्पन्न करती है। प्रत्येक 11 साल में, यह चुंबकीय क्षेत्र अपनी दिशा बदल लेता है यानी उत्तरी और दक्षिणी ध्रुव आपस में बदल जाते हैं।
  • सौर चक्र के विभिन्न चरण:
    • सोलर मिनिमम (सौर न्यूनतम): सौर चक्र की शुरुआत सोलर मिनिमम से होती है। इसमें सूर्य बहुत कम सक्रिय होता है और सौर कलंक (sunspots) कम होते हैं।
      • सौर कलंक: सूर्य की सतह पर काले धब्बों की तरह दिखने वाले और ठंडे क्षेत्र होते हैं, जो प्रबल चुंबकीय गतिविधि के कारण बनते हैं। 
      • हालांकि ये क्षेत्र आसपास की सतह की तुलना में ठंडे होते हैं, फिर भी जब सूर्य पर सौर कलंकों की संख्या अधिक होती है, तो सूर्य कुल मिलाकर अधिक ऊर्जा उत्सर्जित करता है।
    • सोलर मैक्सिमम (सौर अधिकतम): जैसे-जैसे सूर्य अधिक सक्रिय होता जाता है तो वह अधिक "तूफानी" रूप धारण कर लेता है। इस अवधि में सूर्य पर सौर कलंकों की संख्या सबसे अधिक होती है तथा सौर प्रस्फोट व अन्य गतिविधियां भी बहुत बार घटित होती हैं।
  • अंतरिक्ष मौसम पर प्रभाव: सक्रिय चरणों के दौरान, सूर्य पर 'सौर ज्वालाएं' (सोलर फ्लेयर्स) और 'कोरोनल मास इजेक्शन' (CMEs) जैसी बड़ी परिघटनाएं घटित होती हैं।
    • सौर ज्वालाएं' (सोलर फ्लेयर्स): ये सूर्य के सौर कलंक क्षेत्रों में संचित चुंबकीय ऊर्जा के अचानक मुक्त होने से उत्पन्न एक्स-रे और विकिरण के तीव्र प्रस्फोट होते हैं। ये विकिरण प्रकाश की गति से अंतरिक्ष में फैलते हैं।
    • कोरोनल मास इजेक्शन: प्लाज्मा और चुंबकीय क्षेत्रों के विशाल बुलबुले या बादल होते हैं, जिन्हें सूर्य अंतरिक्ष में बहुत तेजी से उछाल देता है। 
    • प्रभाव: 
      • ये पृथ्वी पर बिजली ग्रिड, नौवहन प्रणाली, रेडियो संचार और उपग्रहों को बाधित कर सकते हैं। 
      • इसके अलावा, ये अंतरिक्ष यात्रियों को प्रभावित कर सकते हैं और पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र में भू-चुंबकीय तूफान उत्पन्न कर सकते हैं, जिससे 'ऑरोरा' (ध्रुवीय ज्योति) जैसी परिघटनाएं दिखाई देती हैं।

कोडाईकनाल सौर वेधशाला के बारे में

  • स्थापना: 1899 में स्थापित (इसने तत्कालीन मद्रास वेधशाला का स्थान लिया)।
  • उद्देश्य: यह अध्ययन करना कि सूर्य पृथ्वी के वायुमंडल को कैसे उष्ण करता है और मानसूनी पैटर्न को समझना।
  • अवस्थिति: यह 'भारतीय ताराभौतिकी संस्थान’ (इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ एस्ट्रोफिजिक्स) के प्रबंधन में है। यह तमिलनाडु की पलानी पहाड़ियों में स्थापित है।
  • स्थल चयन का कारण: इस स्थल का चयन भूमध्य रेखा के निकट होने, अत्यधिक ऊँचाई पर स्थित होने और वायु में धूल-कण बहुत कम होने के कारण किया गया था।  
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भारतीय ताराभौतिकी संस्थान (Indian Institute of Astrophysics)

एक स्वायत्त अनुसंधान संस्थान जो खगोल विज्ञान और खगोल भौतिकी के क्षेत्र में अनुसंधान और विकास करता है। यह कोडाईकनाल सौर वेधशाला का प्रबंधन करता है।

ऑरोरा (Aurora)

पृथ्वी के ध्रुवीय क्षेत्रों में रात्रि आकाश में दिखने वाली प्राकृतिक प्रकाश की घटना, जो सूर्य से आने वाले आवेशित कणों के पृथ्वी के वायुमंडल के साथ टकराने से उत्पन्न होती है। इसे ध्रुवीय ज्योति भी कहते हैं।

भू-चुंबकीय तूफान (Geomagnetic Storms)

सूर्य से निकलने वाले आवेशित कणों और पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र के बीच परस्पर क्रिया के कारण उत्पन्न होने वाले बड़े व्यवधान, जो बिजली ग्रिड, उपग्रहों और संचार प्रणालियों को प्रभावित कर सकते हैं।

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