भारत और दक्षिण-पूर्व एशिया के बीच प्राचीन समुद्री व्यापारिक संबंधों ने 500 ईस्वी से 1500 ईस्वी के दौरान न केवल फूनान (वर्तमान कंबोडिया) और श्रीविजय (सुमात्रा) जैसे बंदरगाहों में महत्त्वपूर्ण व्यापारिक बस्तियों की स्थापना को बढ़ावा दिया, बल्कि विचारों या चिन्तनों के व्यापक आदान-प्रदान का भी मार्ग प्रशस्त किया।
- वील कांटेल (कंबोडिया), युपा (इंडोनेशिया) और देवानिका (लाओस) जैसे शिलालेख इस तथ्य के साक्षी हैं।
प्रमुख क्षेत्रों में भारतीय चिंतनों (विचारों) का प्रभाव
- भाषा और साहित्य: थाई, खमेर, मलय, जावानीस और बाली सहित कई दक्षिण-पूर्व एशियाई भाषाओं ने संस्कृत के कई शब्दों को समाहित कर लिए हैं।
- रामायण और महाभारत जैसे भारतीय महाकाव्यों का दक्षिण-पूर्व एशिया की स्थानीय साहित्यिक परंपराओं में अनुवाद और रूपांतरण किया गया।
- धार्मिक प्रभाव:
- वियतनाम की चाम सभ्यता द्वारा निर्मित माई सोन अभयारण्य मूल रूप से भगवान शिव का मंदिर था। यहाँ संस्कृत भाषा के अभिलेख प्राप्त हुए हैं तथा शिवलिंग पूजा के प्रमाण मिलते हैं।
- कंबोडिया का अंकोरवाट मंदिर परिसर मूल रूप से विष्णु का मंदिर था। बाद में अंगकोर थॉम और बेयोन मंदिर में बौद्ध प्रभाव दिखाई दिए।
- थाईलैंड के द्वारवती जैसे स्थलों में बौद्ध धर्म का गहन प्रभाव देखा गया।
- म्यांमार (बर्मा) के बागान के मैदानों में हजारों मंदिर और स्तूप विद्यमान हैं।
- इंडोनेशिया में जावा के शैलेंद्र राजवंश द्वारा निर्मित बोरोबुदुर एक विशाल बौद्ध स्मारक है।
- राजनीतिक प्रभाव: धर्म का उपयोग राजसत्ता (राजत्व) को वैधता प्रदान करने के लिए किया गया। शासकों को देवराज (God-King) समझा जाता था, जो भारतीय राजनीतिक-धार्मिक अवधारणाओं से प्रेरित था, लेकिन उन्हें स्थानीय परिस्थितियों और राजनीतिक आवश्यकताओं के अनुसार अनुकूलित किया गया था।
- निष्पादन कलाएं (परफार्मिंग आर्ट्स): भारतीय नृत्य की सुंदर मुद्राएं, जटिल हस्त-मुद्राएं तथा कथा-वाचन की परंपरा को थाई और कंबोडियाई शास्त्रीय नृत्य रूपों (जैसे-अप्सरा नृत्य) में अपनाया गया।
- भारतीय संगीत परंपराओं तथा सितार, तबला और मृदंगम जैसे वाद्ययंत्रों का प्रभाव भी दक्षिण-पूर्व एशिया की संगीत परंपराओं में देखा जा सकता है।
- स्थापत्य-कला: अंकोरवाट, बोरोबुदुर और माई सोन जैसे स्थलों पर भारतीय प्रतीकात्मक कला तथा पवित्र धार्मिक स्थापत्य-कला का स्पष्ट प्रभाव दिखाई देता है।