NHRC ने रेखांकित किया कि पिछले छह वर्षों में भारतीयों को साइबर-धोखाधड़ी की वजह से लगभग 52,976 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है। इनमें से लगभग 8% मामले 'डिजिटल अरेस्ट' स्कैम से संबंधित हैं।
- साइबर-आधारित धोखाधड़ी वे पारंपरिक अपराध हैं जो पहले ऑफलाइन किए जाते थे, लेकिन सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी (ICT) की वजह से उनकी संख्या, विस्तार और गति कई गुना बढ़ गई है।
डिजिटल अरेस्ट स्कैम के बारे में
- परिभाषा: यह एक प्रकार का स्कैम या घोटाला है जिसे डर, धोखे और धमकी का उपयोग करके पीड़ितों से पैसे ठगने के लिए अंजाम दिया जाता है।
- कार्यप्रणाली: पीड़ितों को एक फोन कॉल, ईमेल या मैसेज प्राप्त होता है जिसमें दावा किया जाता है कि वे पहचान की चोरी (identity theft) या धन-शोधन (मनी लॉन्ड्रिंग) जैसी अवैध गतिविधियों के लिए जांच के दायरे में हैं।
- धमकियाँ और दबाव: ठग गिरफ्तारी की धमकी देकर पीड़ित में घबराहट पैदा करते हैं, जिससे वह बिना सोच-विचार किए उनके निर्देशों का पालन करने लगता है।
डिजिटल अरेस्ट घोटालों पर अंकुश लगाने के सुझाव
- विधिक और विनियामक सुधार: इनमें डिजिटल अरेस्ट घोटालों को एक अलग अपराध के रूप में मान्यता देना; 'म्यूल अकाउंट्स' और इनसे संबद्ध गतिविधियों को आपराधिक बनाना; तथा साइबर धोखाधड़ी को रोकने के लिए OTT संचार प्लेटफार्मों को विनियमित करना शामिल हैं।
- पीड़ितों के लिए सहायता: पीड़ितों के लिए एक विशेष क्षतिपूर्ति निधि स्थापित करनी चाहिए और "गोल्डन आवर" (धोखाधड़ी के तुरंत बाद का समय) के दौरान धोखाधड़ी वाले लेनदेन को तुरंत अवरुद्ध (फ्रीज़) करने की सुविधा प्रारंभ करनी चाहिए।
- एकल सत्यापन पोर्टल: कानून प्रवर्तन एजेंसियों के पहचान-पत्रों, नोटिसों और आधिकारिक संचार की प्रमाणिकता की जांच के लिए एकीकृत सरकारी पोर्टल स्थापित किया जाए।
