लोकसभा अध्यक्ष ने कहा कि विधायिका की कार्यवाही में निरंतर व्यवधान लोकतांत्रिक संस्थाओं के लिए बड़ी चुनौती है | Current Affairs | Vision IAS

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विधायिका की कार्यवाही में व्यवधान (Legislative disruptions) वास्तव में अवरोध का एक रूप है, जिसमें राजनीतिक दल या नेता अपने विशिष्ट राजनीतिक उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए जानबूझकर सदन की कार्यवाही और विधायी कार्यों को बाधित या ठप कर देते हैं।

  • व्यवधान के प्रमुख कारण हैं; दलों के बीच वैचारिक मतभेद, राष्ट्रीय हित के मुद्दों पर पर्याप्त ध्यान न दिया जाना, इत्यादि। 

व्यवधानों के प्रमुख प्रभाव

  • विधायी कार्यों में देरी: व्यवधानों के कारण सदन की कार्यवाही और विधायी कार्य प्रभावित होते हैं। साथ ही, नागरिकों की समस्याओं और चिंताओं को उठाने के मंच के रूप में संसद की भूमिका भी कमजोर पड़ती है।
  • संस्थागत नियंत्रण में कमी: न्यायपालिका के बढ़ते अतिक्रमण तथा कार्यपालिका द्वारा अध्यादेशों का अधिक उपयोग संसद के प्रमुख कार्यों और उसकी प्रभावशीलता को कमजोर करते हैं।
  • विचार-विमर्श आधारित लोकतांत्रिक व्यवस्था का कमजोर होना: ऐसा विधेयकों पर बहुत कम या न के बराबर चर्चा होने के कारण है।
    • उदाहरण के लिए; 17वीं लोकसभा में पारित कुल 179 विधेयकों में से 58% को प्रस्तुत किए जाने के दो सप्ताह के भीतर ही पारित कर दिया गया था, और इनमें से 35% विधेयकों पर एक घंटे से भी कम चर्चा हुई।
  • कार्य समय की हानि: 17वीं लोकसभा (2019–2024) केवल 274 दिनों तक चली, जबकि प्रति वर्ष  बैठकों की औसत संख्या मात्र 55 रही। इससे संसद के प्रभावी कार्य समय में कमी आई।
  • विचार-विमर्श की भावना का क्षरण: 17वीं लोकसभा में प्रस्तुत विधेयकों में से केवल 16% को संसदीय समितियों के पास भेजा गया। इससे विशेषज्ञों द्वारा होने वाली विस्तृत जांच और समीक्षा की महत्त्वपूर्ण प्रक्रिया कमजोर पड़ गई।

विधायिका की कार्यवाही में व्यवधान को दूर करने के उपाय

  • विधायी कार्यक्रमों को संचालित करने और सहयोग करने के लिए एक 'संसदीय विधायी समिति' गठित करनी चाहिए।
  • 'कार्य सलाहकार समिति' की सर्वदलीय बैठक आयोजित होनी चाहिए ताकि आम सहमति से साप्ताहिक एजेंडा तय हो।
  • ब्रिटिश संसद की तर्ज पर कुछ दिनों को इस प्रकार निर्धारित किया जा सकता है, जिनमें विपक्षी दल सदन में चर्चा के लिए विषय और कार्यसूची तय करें।
  • संविधान के कार्यकरण की समीक्षा हेतु राष्ट्रीय आयोग (2002) की सिफारिशों के अनुसार संसद के वार्षिक बैठक-दिवस बढ़ाए जाने चाहिए, ताकि विधायी कार्यों और जनहित के मुद्दों पर पर्याप्त चर्चा सुनिश्चित हो सके। 
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संविधान के कार्यकरण की समीक्षा हेतु राष्ट्रीय आयोग (National Commission to Review the Working of the Constitution)

यह एक आयोग था जिसे भारत के संविधान के कामकाज की समीक्षा करने और उसमें सुधार के लिए सिफारिशें देने का कार्य सौंपा गया था। इसने संसद के वार्षिक बैठक-दिवस बढ़ाने जैसी सिफारिशें की हैं।

कार्य सलाहकार समिति (Business Advisory Committee)

एक समिति जो संसद की कार्यसूची को तय करने में मदद करती है, और जिसकी सर्वदलीय बैठकें आम सहमति से साप्ताहिक एजेंडा तय करने में सहायक होती हैं।

संसदीय विधायी समिति (Parliamentary Legislative Committee)

विधायी कार्यक्रमों को संचालित करने और सहयोग करने के लिए गठित की जाने वाली एक समिति, जिसका उद्देश्य विधायी प्रक्रिया को सुचारू बनाना है।

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