भारत द्वारा हस्ताक्षरित मुक्त व्यापार समझौतों (FTAs) के समक्ष प्रमुख चुनौतियां | Current Affairs | Vision IAS

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In Summary

  • भारत और ओमान के बीच मुक्त व्यापार समझौता 1 जून, 2026 से लागू हो गया। इसके साथ ही, भारत ने अब तक 15 मुक्त व्यापार समझौते किए हैं जिनमें 27 देश शामिल हैं।
  • वित्त वर्ष 2025 में संयुक्त अरब अमीरात, ऑस्ट्रेलिया, मॉरीशस और EFTA देशों के साथ भारत का व्यापार घाटा 50 बिलियन डॉलर से अधिक रहा।
  • कच्चे माल पर अधिक शुल्क और इनसे तैयार माल पर कम शुल्क होने के कारण, भारतीय घरेलू विनिर्माताओं की उत्पादन लागत बढ़ जाती है।

In Summary

भारत और ओमान के बीच मुक्त व्यापार समझौता 1 जून, 2026 से लागू हो गया। इसके साथ ही, भारत ने अब तक 15 मुक्त व्यापार समझौते किए हैं जिनमें 27 देश शामिल हैं। 

  • हालांकि, बढ़ते व्यापार घाटे, बढ़ते आयात और घरेलू विनिर्माण पर दबाव के कारण भारत द्वारा संपन्न मुक्त व्यापार समझौतों की व्यापक समीक्षा की जा रही है।

FTAs के समक्ष मुख्य चुनौतियां

  • बढ़ता व्यापार घाटा: वित्त वर्ष 2025 में संयुक्त अरब अमीरात, ऑस्ट्रेलिया, मॉरीशस और EFTA देशों के साथ भारत का व्यापार घाटा 50 बिलियन डॉलर से अधिक रहा। 
    • आसियान, जापान और दक्षिण कोरिया के साथ औसत व्यापार घाटा लगभग 62 बिलियन डॉलर प्रति वर्ष रहा है। 
    • दक्षिण एशिया एकमात्र अपवाद है, जिसके साथ भारत का व्यापार अधिशेष 6.7 बिलियन डॉलर से बढ़कर 20 बिलियन डॉलर हो गया है।
  • टैरिफ में विषमता: FTAs के तहत भारत अपने आयात शुल्क में कटौती करता है, जिससे विदेशी वस्तुएं भारत में सस्ती हो जाती हैं। इसके विपरीत, उन देशों में भारतीय निर्यात को बहुत कम लाभ मिलता है जहां पहले से ही शुल्क कम हैं।
  • भारतीय निर्यातकों द्वारा कम उपयोग: भारतीय निर्यातक FTAs का पूरा लाभ नहीं उठा पा रहे हैं; केवल 20-30% पात्र निर्यात ही इन समझौतों के अधिमान्य (तरजीही) प्रावधानों का उपयोग करते हैं। इसका मुख्य कारण नियमों का पालन करने की उच्च लागत है, जो मिलने वाले शुल्क लाभ से अधिक हो जाती है।
  • इनवर्टेड ड्यूटी स्ट्रक्चर (व्युत्क्रम शुल्क संरचना): कच्चे माल पर अधिक शुल्क और इनसे तैयार माल पर कम शुल्क होने के कारण, भारतीय घरेलू विनिर्माताओं की उत्पादन लागत बढ़ जाती है।
  • विनिर्माण कार्यों का विदेशों में स्थानांतरण: सस्ती उत्पादन लागत और भारतीय बाजार में शुल्क-मुक्त पहुंच के कारण कंपनियां 'मेक इन आसियान, सेल इन इंडिया' (आसियान में विनिर्माण और भारत में बिक्री) की रणनीति अपना रही हैं। इससे भारत का अपना विनिर्माण क्षेत्रक पिछड़ रहा है।

आगे की राह 

  • प्रशुल्क की समीक्षा: औद्योगिक कच्चे माल (इनपुट्स) पर शुल्क को मुक्त व्यापार समझौतों की प्रतिबद्धताओं के साथ संतुलित करना चाहिए ताकि घरेलू आपूर्ति श्रृंखला मजबूत हो सके और इनवर्टेड ड्यूटी स्ट्रक्चर को खत्म किया जा सके।
  • अनुपालन को सरल बनाना: भारतीय निर्यातकों के लिए 'उत्पति के नियम' (रूल्स ऑफ़ ओरिजिन) जैसे जटिल FTAs नियमों को आसान बनाना चाहिए ताकि वे इनका लाभ उठा सकें।
  • घरेलू विनिर्माण को बढ़ावा: 'मेक इन इंडिया' पहल के तहत औद्योगिक प्रतिस्पर्धात्मकता को और सुदृढ़ करना चाहिए ताकि भारतीय उत्पाद वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी हो सकें।
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मेक इन इंडिया (Make in India)

भारत सरकार द्वारा 2014 में शुरू की गई एक पहल है जिसका उद्देश्य भारत को विनिर्माण के लिए एक वैश्विक केंद्र बनाना है।

उत्पत्ति के नियम (Rules of Origin)

ये ऐसे मानदंड हैं जिनका उपयोग यह निर्धारित करने के लिए किया जाता है कि कोई उत्पाद किस देश का मूल निवासी है। यह अक्सर टैरिफ, व्यापार समझौते और व्यापार आंकड़े निर्धारित करने के लिए महत्वपूर्ण होता है।

इनवर्टेड ड्यूटी स्ट्रक्चर (व्युत्क्रम शुल्क संरचना)

यह एक ऐसी स्थिति है जहाँ किसी उत्पाद के निर्माण में उपयोग होने वाले कच्चे माल या मध्यवर्ती वस्तुओं पर तैयार उत्पाद की तुलना में अधिक आयात शुल्क लगता है। इससे घरेलू उत्पादकों के लिए उत्पादन लागत बढ़ जाती है।

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